अच्छा लगता
जब तुम खिलखिलाकर हंसते
तुम्हारे चेहरे का नूर
द्रव्यीभूत हुआ सूक्ष्म सौन्दर्य देता
आत्मा की असीम गहराई मे
हिलोरे उठने लगती आनंद भरी उर्ध्वगामी
नहीं होता फिर मै स्व खोया
रागात्मकता का अकथ नशा
नहीं रहता सशरीर केवल अनुभूति का
रहस्यमय रससागर लहरों की उर्मियां देता
भीगो भीगो देता तन मन मेरा
आह अब नहीं तुम साक्षात सशरीर
दे गये मात्र अतीत
नकारा स्मृति भरा कि चेतन तडप पाये
अचेतन से आकार ले तुम्हारा
सुरभि सचेत उर्ध्व उठा
निहारना नहीं होता वहां मूर्त नैनों से
अंतर का अहसास
करता जाता इन्द्रियों सा कर्म
आने नहीं जरूरत
वहीं रहो प्रिय तुम करते रहो प्रशस्त
जीवन जलन जजबात का ज्वार
कि लगता रहे हर पल
तुम संग आतुर रहूँ विकल प्राणों की
चेतन दशा लेकर
अब करो ना उपाय
हमारे स्वप्न फिर एक हकीकत बने
ओर नूर सौन्दर्य से नहाये
संसार सारा ।
छगन लाल गर्ग ।
जब तुम खिलखिलाकर हंसते
तुम्हारे चेहरे का नूर
द्रव्यीभूत हुआ सूक्ष्म सौन्दर्य देता
आत्मा की असीम गहराई मे
हिलोरे उठने लगती आनंद भरी उर्ध्वगामी
नहीं होता फिर मै स्व खोया
रागात्मकता का अकथ नशा
नहीं रहता सशरीर केवल अनुभूति का
रहस्यमय रससागर लहरों की उर्मियां देता
भीगो भीगो देता तन मन मेरा
आह अब नहीं तुम साक्षात सशरीर
दे गये मात्र अतीत
नकारा स्मृति भरा कि चेतन तडप पाये
अचेतन से आकार ले तुम्हारा
सुरभि सचेत उर्ध्व उठा
निहारना नहीं होता वहां मूर्त नैनों से
अंतर का अहसास
करता जाता इन्द्रियों सा कर्म
आने नहीं जरूरत
वहीं रहो प्रिय तुम करते रहो प्रशस्त
जीवन जलन जजबात का ज्वार
कि लगता रहे हर पल
तुम संग आतुर रहूँ विकल प्राणों की
चेतन दशा लेकर
अब करो ना उपाय
हमारे स्वप्न फिर एक हकीकत बने
ओर नूर सौन्दर्य से नहाये
संसार सारा ।
छगन लाल गर्ग ।