Tuesday, June 7, 2016

अनुभूतियों का स्मरण

टटोलने लगा 
जीया अतीत 
अनुभूतियों का स्मरण 
उन्माद भरे
मदहोशी के पल
करते अब अधिक विकल
जहां निश्छल भाव
वसूल नही सके
सुखद अवसरो का
आशियाना
ओर न ही
कर पाये चेतन
सुख की श्रृंखला
परिवर्तनीय जगत पदार्थ
की गुणवत्ता से
टटोलने का क्रम आज तक
अनवरत
देह गेह ओर सांसारिक नेह से
पर नही मिटती प्यास
चेतन रहता अवशेष
अधूरेपन का दर्द लिए
व्यतीत हो रहा हर क्षण
तृष्णा जगत गागर की
क्षणिक सुख बूँद
समझ बैठे सुख सागर
ओर असलियत से होता रहा
अंतराल निरंतर
लंबा चला शायद मदहोशी
अभी तलब मिटी कहां
अच्छा हो
अचेतावस्था से पहले
केवल झलक भर पाऊँ
काफी होगा
विस्मृति हुआ नव चेतन करे
तलाश पूरी अनंत की ।
छगन लाल गर्ग ।