रूकना पडता
हर लंबे सफर के बाद
सामर्थ्य दे जाता जवाब
औकात का दायरा
देता जाता पहचान
मानव क्षमता की
ओर मानवीय अहंकार
लेता आकार तपन
ढूँढने लगता
शब्दावली असीम से हौड भरी
नही थकता जुबान से
शब्दों की दुनिया
बदलती वाक शैली के साथ
नाटकीय हाव भाव लिए
करती जाती
काल्पनिक दृश्य उपस्थित
मोहक अलौकिक ओर दंभ भरे
ओर इसी झूठ हमारी
बितती जाती जिन्दगी स्वप्निल
शब्द झूठ का आपसी रिश्ता
बहुत सूक्ष्म बहुत गहरा
बदौलत हमारे निभता जाता
ओर हम अकारण झूठ जीते
केवल जिवंत रहने निमित्त
असल हकीकत से बहुत दूर
जीता हूँ जिन्दगी तुझे
हुआ प्रबुद्ध तभी से
जीवन का
नव अवतरण पाया
प्रभुता जीवन
निम्नतम नही रहा अब
कि रहता हो भाव स्पंदन
विराट हुआ जाता विलय
मानव विकसित
विशिष्टता संग
नही जानता पर अहसास होता
मद आसपास के
संग्रहित किये अपने वैभव
आह अन्नत ख्यात
ख्वाहिश का खजाना
मेरा अपना
क्या होगा अंजाम मेरा
नही विषय विवेक
आज मात्र झूठ बना श्रृंगार मेरा
यही सत्य यही सार
परिवर्तन से पहले
नही चाहता रूकना पर
लंबे कर्म की थकान संध्या बनी
अंजाम सरकता जाता
शून्य बन गहन अज्ञात मे
ओर मैं डूबा सा समूचा
गर्त का सत्य बना ।
छगन लाल गर्ग ।
हर लंबे सफर के बाद
सामर्थ्य दे जाता जवाब
औकात का दायरा
देता जाता पहचान
मानव क्षमता की
ओर मानवीय अहंकार
लेता आकार तपन
ढूँढने लगता
शब्दावली असीम से हौड भरी
नही थकता जुबान से
शब्दों की दुनिया
बदलती वाक शैली के साथ
नाटकीय हाव भाव लिए
करती जाती
काल्पनिक दृश्य उपस्थित
मोहक अलौकिक ओर दंभ भरे
ओर इसी झूठ हमारी
बितती जाती जिन्दगी स्वप्निल
शब्द झूठ का आपसी रिश्ता
बहुत सूक्ष्म बहुत गहरा
बदौलत हमारे निभता जाता
ओर हम अकारण झूठ जीते
केवल जिवंत रहने निमित्त
असल हकीकत से बहुत दूर
जीता हूँ जिन्दगी तुझे
हुआ प्रबुद्ध तभी से
जीवन का
नव अवतरण पाया
प्रभुता जीवन
निम्नतम नही रहा अब
कि रहता हो भाव स्पंदन
विराट हुआ जाता विलय
मानव विकसित
विशिष्टता संग
नही जानता पर अहसास होता
मद आसपास के
संग्रहित किये अपने वैभव
आह अन्नत ख्यात
ख्वाहिश का खजाना
मेरा अपना
क्या होगा अंजाम मेरा
नही विषय विवेक
आज मात्र झूठ बना श्रृंगार मेरा
यही सत्य यही सार
परिवर्तन से पहले
नही चाहता रूकना पर
लंबे कर्म की थकान संध्या बनी
अंजाम सरकता जाता
शून्य बन गहन अज्ञात मे
ओर मैं डूबा सा समूचा
गर्त का सत्य बना ।
छगन लाल गर्ग ।