किसकी छूटी
वासना
यह तो आजीवन
छाया बनी
देह की
नही छोडती साथ
जीवित रहते
अंतिम घडी तक
मन का अतृप्त भंवर
संसार चाहता
भोगा हुआ बार बार
अकारण अतृप्त रहता फिर
चाहता नित नयापन
ओर इधर
अहंकार का छाया
बढता घेरने लगता निर्दोष
अजीज अपनत्व
आशक्ति संसार होता रहता
अधिक विस्तृत
जैसे बढती धूप
अधिक वासना
लेती जाती उफान
अन्नत संग्रह सुख का
होता रहता घनीभूत
सकल वासना का दरिया
बन बन जाता
अतृप्ति का दरिया
भरता भरता भी रह जाता
खाली अनभरा शुष्क
पाया हो जाता अनपाया
अपने लिए भीतरी देता अहसास
ओर इसी को
दुनिया देखती भरा भरा
नजरो का तिलस्म यह
मृगतृष्णा का
खेल खेलती जाती
जिन्दगी ताउम्र
नही पाता जीवन
शांत घनीभूत छाया
ना हो धूप
ओर नही उभर सके
फिर धूप
रहे नित छाया मे देह
वासना छाया
शांत मौन हो सके
समग्र अस्तित्व
विचार ना रहे
मै ना रहे
भोग ना रहे भोक्ता ना रहे
यह क्षण आना चाहता
आने तो दो
तनिक धैर्य भी हो
आता हैं पल जीवन
जरा पकडना आ सके ।
छगन लाल गर्ग ।
वासना
यह तो आजीवन
छाया बनी
देह की
नही छोडती साथ
जीवित रहते
अंतिम घडी तक
मन का अतृप्त भंवर
संसार चाहता
भोगा हुआ बार बार
अकारण अतृप्त रहता फिर
चाहता नित नयापन
ओर इधर
अहंकार का छाया
बढता घेरने लगता निर्दोष
अजीज अपनत्व
आशक्ति संसार होता रहता
अधिक विस्तृत
जैसे बढती धूप
अधिक वासना
लेती जाती उफान
अन्नत संग्रह सुख का
होता रहता घनीभूत
सकल वासना का दरिया
बन बन जाता
अतृप्ति का दरिया
भरता भरता भी रह जाता
खाली अनभरा शुष्क
पाया हो जाता अनपाया
अपने लिए भीतरी देता अहसास
ओर इसी को
दुनिया देखती भरा भरा
नजरो का तिलस्म यह
मृगतृष्णा का
खेल खेलती जाती
जिन्दगी ताउम्र
नही पाता जीवन
शांत घनीभूत छाया
ना हो धूप
ओर नही उभर सके
फिर धूप
रहे नित छाया मे देह
वासना छाया
शांत मौन हो सके
समग्र अस्तित्व
विचार ना रहे
मै ना रहे
भोग ना रहे भोक्ता ना रहे
यह क्षण आना चाहता
आने तो दो
तनिक धैर्य भी हो
आता हैं पल जीवन
जरा पकडना आ सके ।
छगन लाल गर्ग ।