Tuesday, June 7, 2016

मिलन अविरल हो

मेरे परम विराट 
हृदय गगन में
अपनी चेतन तरंग
उभरने दो
प्राण प्रियतम पुलक
समा जाने दो
उभर आया 
तरल तार बन स्मरण
तुम्हारा भीगने लगा
तन मन सर्वस्व अस्तित्व 
नही पहचान पाता 
स्व अर्द्ध अचेतन दशा
हुआ जाता घुलनशील
तेरे रंग माधुर्य 
विरल स्पंदन सा हुआ 
ढक जाने दो
आह अमरत्व आभासित
अंततः अचेत सा
बहुत झीनी आभासित मात्र 
सूक्ष्म छाया 
अब देती तपन तडपन
भाव भरती भंगिमा बन
कृत्य यह कैसा अति कमनीय 
आह प्रज्वलित कनक आभा
हुआ स्थूल विकल व्यथित
व्यञ्जंना सा
पूरित नव गागर भरता
स्नेह सागर पावन प्रिय 
बहता जाता प्रेम नीर
द्रव्य बन अस्तित्व बहता
अब मिलन रजनी आई 
देती संकेत प्रभात लाई
अनवरत आनंद बेला
आज संगीत मद साज छाया
मिलन प्रिय अब मन 
उन्माद छाया
रागिनी नव राग कहती
साधना का परिणाम कहती
मुस्कान देने लग 
गई रे
परत परत नभ अधर बन बन
आलेख 
अक्षर समझ आया
अवनी अंबर आलिंगन अद्भुत 
यह पल नहीं रे 
विलय हुआ हूँ 
महापलों का सागर गहरा
विस्मृत विस्तृत विराट वैभव
वासना पर विजय विलय
हलचलों का हौसला आज 
नहीं संवर्धन हिसाब लेता
अलौकिक आकार हूँ मैं 
तत्व की पहचान हूँ मैं 
प्रभु मिलन अविरल होने दो
छगन लाल गर्ग