Tuesday, June 7, 2016

निरंतर का नमस्कार

अब तनिक जमा विश्वास 
अधिक घीसने से जटिल सूत्र 
होता कंठस्थ ठीक वैसे 
निरंतर का नमस्कार 
अब दे पाया ऐतबार
सज्जनता का
अब पुजारी जी 
साई चरणों का
कुसुम भेट प्रसादी की 
शेष थेली मे
रखते हैं 
अच्छा लगता हैं अब
मंदिर मे जीवंत चेतना का 
अहसास 
मिलता जाता
रात दिन साँई के शरणों मे
सौभाग्य पाये पुजारी जी 
अंतरंग क्षणों 
जरूर मेरी अबोध
सज्जन प्रवृत्ति 
कहते होंगे सांई से
महसूस करता हूँ मैं 
अनकहे अचेतन मे भाव प्रवाह
बहुत कुछ कर देते
केवल अहसास की स्मृति 
वहीं पाता 
जो विस्मृत हुआ चेतन 
अस्वीकार भी
ओर क्षणभंगुर स्वीकृति 
अंतर से पाया हो
यह अच्छा शायद 
अब चैतना
अन्तरमन का अचेतन
अहसास पाता
प्रफुल्लित श्रृद्धा महारस पीता
छगन लाल गर्ग