Tuesday, June 7, 2016

कहां जीता हूँ मैं

कहां जीता हूँ मैं 
क्या यही जीना
अहसास इतना सा कि
चल रही श्वासे
पूरी तरह जीने लगा बेहोशी
नहीं पता क्या जीया 
ओर क्यों 
एक अनवरत देखा देखी
कौशल मिलता रहा 
अपनो से भी परायो से भी
अनछुआ रहा 
स्व स्फूरण नहीं पाया 
जिन्दगी का रहस्यमय हर क्षण
नहीं आया समझ
शायद ओरो को भी
अधिक गहराते अर्थ 
जब खोलना चाहता परत जीवन 
नहीं मिलता अंतिम छोर
कि खत्म कर सकूं विचारों का धुँऑ
लगता
हर इंसान जन्म लेते ही
मरता रहता हर पल
ओर करिश्मा यह भी
नित परिवर्तित अस्तित्व को जानता भी
कितना अजान साबित करता
प्रकृति झुठलाने के प्रयास 
कभी सुख का कभी दुख का अहसास 
प्रवृत्ति नहीं अहंकार 
जीवन का मूल कि हो जाता जीना
अन्यथा यह जीवन 
मृगतृष्णा का घना भ्रमित जाल
नहीं आता पसंद किसी को
चलो जीते जा रहे
नित मरते यह अमूल्य जीवन 
बिना अर्थ समझे
अंतिम अचेतन होने तक
छगन लाल गर्ग