तडप मेरी कहां
जरा झाको तो
असीम अनंत भी
विकल हुआ जाता
मानव मन की विकृति पर
आता हैं विवेक का बहाव
संभलते भी बहाता जाता
नेह हृदय सागर के
सुरभित कुसुम
कि जगह
सूनापन लिए
बसता जाता हैं एक संसार
जहां होती रहती हैं
निर्जीव धन संपदा की गुन्जार
बजते संगीत भी
धमाके करते तोडते जाते
भावनाओं के तार
तडप कहां भावों की
चमक पाता
चमकते कृत्रिम जीवन की
यह सत्य युग का
क्या तडप नहीं
कि जीवन निष्प्राण हुआ
बढता जाता
तृष्णा के कुलबुलाते बहते मवाद बीच
जहाँ कीड़ों सी जिन्दगी
जीना विवशता होगी हमारी
प्रकृति से विवेक का जुडना
विलय होना
ओर पर हित जीना
क्या आयेगा
एक आशा मानवता से करता
बितता जाता हैं हर दिन
तडप यह मेरी कहां
हर सहृदय जीवन की
कि प्रभात लौटे ।
छगन लाल गर्ग।
जरा झाको तो
असीम अनंत भी
विकल हुआ जाता
मानव मन की विकृति पर
आता हैं विवेक का बहाव
संभलते भी बहाता जाता
नेह हृदय सागर के
सुरभित कुसुम
कि जगह
सूनापन लिए
बसता जाता हैं एक संसार
जहां होती रहती हैं
निर्जीव धन संपदा की गुन्जार
बजते संगीत भी
धमाके करते तोडते जाते
भावनाओं के तार
तडप कहां भावों की
चमक पाता
चमकते कृत्रिम जीवन की
यह सत्य युग का
क्या तडप नहीं
कि जीवन निष्प्राण हुआ
बढता जाता
तृष्णा के कुलबुलाते बहते मवाद बीच
जहाँ कीड़ों सी जिन्दगी
जीना विवशता होगी हमारी
प्रकृति से विवेक का जुडना
विलय होना
ओर पर हित जीना
क्या आयेगा
एक आशा मानवता से करता
बितता जाता हैं हर दिन
तडप यह मेरी कहां
हर सहृदय जीवन की
कि प्रभात लौटे ।
छगन लाल गर्ग।