Friday, June 10, 2016

सामर्थ्य

खोते जाते हैं शब्द 
सामर्थ्य अपना
निर्धारित अर्थो का
देने होते हैं अकाट्य तर्क
कि ले सके श्वास 
ओर बना सके अस्तित्व
आज का युग
साक्ष्य पर भी संचय
जीता हैं
ओर यह अभिव्यक्ति
मेरी हो कि तुम्हारी
बिम्बात्मक दृश्य चाहती हैं
कि अटक जाये भाव
समूची चेतना ले सके निर्णय
तोल सके अभिव्यक्ति
अभिव्यक्ति की शिथिलता दब ढक जाय
चित्र तले
ओर चलती रहे सृजन की गरिमा
शब्दों की अभिव्यक्ति से ज्यादा
आज का युग पोस्टरो पर
ज्यादा विश्वास करता हैं
अब नही चलता शाश्वत सत्य
शब्दों से प्रकट हुआ
जो भीतर से पाता हैं अभिव्यक्ति
देने होंगे साक्ष्य
जर्जर नाव के
बीच सागर डूबती हुई
ओर खुद को नाव सहित डूबने पर भी
चेहरा बचाना होगा
कि साक्ष्य बने तुम डूबे हो
यह अर्थ शब्द नहीं चित्र देगा
तुम्हारे शब्द आज फीके हैं
अर्थ खो चुके घीस गये
अब न पाठक हैं न शब्दों मे दम हैं
कि जुड़े पाठक
एक सत्य ओर
आज के रचनाकार का सच
करते जाते हैं तैयार
समुदाय
होती जाती चित्रमय रचनाएँ
ओर बाँधे जाते हैं तारिफो के सेतु
गुणवता के पैमाने हवा हुए
ओर शब्द निरर्थक हुए
चमक अपनी खो चुके।
छगन लाल गर्ग।