Friday, June 10, 2016

युग साम्यता

युग साम्यता पाना चाहता
मेरा अस्तित्व 
व्यक्तित्व निखार की चाह तले
संघर्ष ढूँढता जाता 
नित नये हथकंडे
तृष्णाओ का रेला आज भी
पिसता जाता भीतर का सच
ओर जो हूँ नहीं
वहीं बन जाता विभत्सा का रूप लिए
नया ताजा दिखने का यह खेल
हर दिन खोजता रहता
नये नये नुस्खे
क्या हो
दीवार पर टंगी पुरानी तस्वीर
मेरी अपनी
कहां पहचान पायेगी मुझे
मैल नहीं खाती
आज की जिन्दा फोटो से
वहीं मैं था फोटो कहती
पर वहीं सुन्दरता
आज परिवर्तित हुई
बदली हैं कुरूपता मे
अब आने लगी हैं समझ
वस्तुओं की कुरूपता
कि चमक खोती हैं
समय के चलते
ओर मैं इस सत्य को
नासमझ बना करता जाता हूँ
अस्वीकार
रंग देता हूँ व्यक्तित्व
बाजारू नित नये रंगों से
पर नहीं फबते
बेमेल रंग
कुरूपता मे भी अवशेष बची
परिपक्वता का सौन्दर्य
ढक जाता हैं बाजारू रंगों मे
चमक रह जाती केवल
रंगीन वस्त्रो ओर सौन्दर्य प्रसाधनो की
मैं हो जाता हूँ भीतर ओर बाहर
दोनों रूपों मे फीका
क्या यह ठीक हैं मेरा व्यक्तित्व
बेमेल व्यक्तित्व लिए
युग साम्यता का दावा करना
भीतर बार बार पुकार उठती
अदृश्य मौन मूक
छोडो भी
बेमेल जीने का आग्रह
स्वीकार करो खुद को
जैसे हो
क्यों करते हो व्यक्तित्व से ऐच तान
यह रंगत नहीं देगा
प्रदर्शन होगा
ओर हर प्रदर्शन आत्महीन हैं
चाहते हो अस्मिता अपनी
रहो वहीं जैसे हो
यहीं हैं असली ताजगी
ओर निखर निखर जाते हो
अपनी शुद्ध आत्मा के साथ
सत्य की पराकाष्ठा हैं
परिपक्वता तुम्हारी
देह की सजावट से
ज्यादा अच्छा होगा
अंतिम सत्य भीतर का सुनो।
छगन लाल गर्ग।