तुम्हें मसीहा कह दू
तुम्हारी आत्मा बुरा तो नहीं मानेगी
अपने जीवन काल का संघर्ष
क्या तुम्हें मसीहा नहीं बनाता
जिस उत्पीड़न मे जीये हो
क्या वह सामान्य रहा
शिक्षित होने का अवसर
क्या तुम्हारे जीवन का वरदान नहीं
कि निखरे तुम
विषमता मे समता की भावना
क्या तुम्हारा परिपक्व बुद्धत्व नहीं रहा
अपने समाज का हित
उसके अस्तित्व की दिशा राह
अवसरों की स्थापना निमित्त
स्वयं का बलिदान देना
क्या सामान्य व्यक्तित्व कह दू
नही मेरे मसीहा
नहीं हो पायेगा यह
राष्ट्र के सूर्य का प्रतिरूप बने हो तुम
यह रोशनी प्राणो को नहाती
पावनता के साथ
निखर उठता हूँ मैं
एक अमूल्य निधि हो तुम
मन के अंधेरो को
रोशनी भरा जीवन तुम्हारा
देता जाता हैं राहो की रश्मिया
कहने दो मुझे
मानव जगत का मसीहा
जीवन जीने के अतीत मे
एक मसीहा कहे जाने का आघात
तुम्हारी आत्मा से निवेदन हैं
ओर सहे
क्यों कि जिन्दा रहते
परिपक्वता पाई हैं
हरेक अमानवीय आघातो को सहने की
मेरे भीम
तुम्हारी ही धुन्धली छाया के सहारे
रास्तो के अकाट्य अवरोध
झूझता बढता हूँ आगे
इतने अर्से बाद भी
फासलो का सिमटाव
बाकी हैं ।
छगन लाल गर्ग।
तुम्हारी आत्मा बुरा तो नहीं मानेगी
अपने जीवन काल का संघर्ष
क्या तुम्हें मसीहा नहीं बनाता
जिस उत्पीड़न मे जीये हो
क्या वह सामान्य रहा
शिक्षित होने का अवसर
क्या तुम्हारे जीवन का वरदान नहीं
कि निखरे तुम
विषमता मे समता की भावना
क्या तुम्हारा परिपक्व बुद्धत्व नहीं रहा
अपने समाज का हित
उसके अस्तित्व की दिशा राह
अवसरों की स्थापना निमित्त
स्वयं का बलिदान देना
क्या सामान्य व्यक्तित्व कह दू
नही मेरे मसीहा
नहीं हो पायेगा यह
राष्ट्र के सूर्य का प्रतिरूप बने हो तुम
यह रोशनी प्राणो को नहाती
पावनता के साथ
निखर उठता हूँ मैं
एक अमूल्य निधि हो तुम
मन के अंधेरो को
रोशनी भरा जीवन तुम्हारा
देता जाता हैं राहो की रश्मिया
कहने दो मुझे
मानव जगत का मसीहा
जीवन जीने के अतीत मे
एक मसीहा कहे जाने का आघात
तुम्हारी आत्मा से निवेदन हैं
ओर सहे
क्यों कि जिन्दा रहते
परिपक्वता पाई हैं
हरेक अमानवीय आघातो को सहने की
मेरे भीम
तुम्हारी ही धुन्धली छाया के सहारे
रास्तो के अकाट्य अवरोध
झूझता बढता हूँ आगे
इतने अर्से बाद भी
फासलो का सिमटाव
बाकी हैं ।
छगन लाल गर्ग।