Thursday, June 9, 2016

रेत सा शुष्क।

कहता जाता
भीतरी आवाज
गहरी अंतर्वेदना लिपटी 
नहीं मिलता आवाज को
आकार
शब्द दे जाते दगा
नहीं लेते बिंब
मानव चित संवेदना के
रह जाता अधूरा
शायद नहीं होते
अनंत का भेद लिए
कि जीया जाय
मानव रहकर
बनना सहृदय नही रहा
युग की चेतना रहते
और अचेतन मौन
निरह हुआ
टटोलता जाता मानव
बेशब्द
जहां बहते हो उसकी
गहराईयो मे
स्नेह के निर्झर
नहीं पाता अंतर मे
नीर सी द्रव्यता
लगता युग तपन रहते
सुख गया निर्झर
तब्दील हुआ जाता
नित्य
रेत सा शुष्क।
छगन लाल गर्ग।