हर गलती पश्चात
होता है पछतावा
भीतर भीतर
नहीं स्वीकारता बाहर
अपनी कमजोरी
जो अमिट जुडी जीवन
नहीं आती बाहर
दबाता जाता
अपनी सामर्थ्य रहते
ओर हो जाता हूँ पाक साफ
कि लगे नहीं कही खोट
मन आचरण मे
यह स्थति नहीं रहने देती
मुझे काबिल
सामान्य व्यक्ति के करीब
बनता हूँ आदर्श
औरो का
समझदारी लिए
जबकि महसूसता जाता
अपने को झूठ जीता
दोगला इनंसान
अपनी असलियत
छिपाने की कला
तब अधिक दंभ भरती
जब समझदारों के बीच
करनी होती
सिद्धांतो की चर्चा
बिना अनुभूति के
विवेकी धारा
वाक्शक्ति शब्द पहने
करती है प्रदर्शन
बडा अजीब लगता
अछूता प्रदर्शन
पर भीतर ही डरा डरा
जीने लगा हूँ
गलतियां जीती जिन्दगी से।
छगन लाल गर्ग।
होता है पछतावा
भीतर भीतर
नहीं स्वीकारता बाहर
अपनी कमजोरी
जो अमिट जुडी जीवन
नहीं आती बाहर
दबाता जाता
अपनी सामर्थ्य रहते
ओर हो जाता हूँ पाक साफ
कि लगे नहीं कही खोट
मन आचरण मे
यह स्थति नहीं रहने देती
मुझे काबिल
सामान्य व्यक्ति के करीब
बनता हूँ आदर्श
औरो का
समझदारी लिए
जबकि महसूसता जाता
अपने को झूठ जीता
दोगला इनंसान
अपनी असलियत
छिपाने की कला
तब अधिक दंभ भरती
जब समझदारों के बीच
करनी होती
सिद्धांतो की चर्चा
बिना अनुभूति के
विवेकी धारा
वाक्शक्ति शब्द पहने
करती है प्रदर्शन
बडा अजीब लगता
अछूता प्रदर्शन
पर भीतर ही डरा डरा
जीने लगा हूँ
गलतियां जीती जिन्दगी से।
छगन लाल गर्ग।