तुम आते क्यों नहीं
भावनाओं मे भी
हर क्षण रहता
विरान मेरा
बन गया हूँ भार
खुद अपना
बिना तुम्हारें
नसीब नहीं जाना
उम्र रहते
सुनना सत्य
मानू कैसे
कि होते भी हो तुम
हर गली
लेती पहनावा
नित नया
नही होता आभास
कि बद्हाली झेल
हुई खुशहाल
कहते सुनता
बडे लोगों के ही
होते हो तुम
घृणा है तुम्हें हमसे
यह सच यदि तो
क्यों रहते
दिल की आशा मे
चेतन बने
हर पल
गहरे निश्वास बन
उभरते सताते
सपने बने
नहीं चाहत
वैभव की
चाहत मात्र
जिने की
कि कभी पलटो
और देखो ना
हमें भी
सर्द हवाओं के
निर्मम झौके
किस कदर सुलाते जाते
असीम नींद की आगोश
मेरे नन्हे से फूल
बिना सौरभ बिखेरे
मिल जाते धूल
ओर मुरझा चुकी
टहनियो मे
नहीं उभर पाते
नवल कपोल
या कि नव कुसुम
श्वासों को
नहीं मिलती
प्राण वायु
बिना तुम्हारे
जीवन जमीन की
उर्वरा मे
विकसित होते जाते
शिला खंडों की
दीवार ताने
विशाल अहं के
नभमापी भवन
अब कहों ना
कब करोगे
हमारी ओर रूख
विवश तो नहीं तुम
हमारी तरह
कि झकडे हो
जंजीरों से
अमीरों की
नहीं सामर्थ्य
कि छूटकारा पाओ
लगता यहीं
बिना जंजीर तोडे
तुम्हारी मुक्ति नहीं
हमारी चेतना ही
तुम्हारी मुक्ति
सूर्य तमतमाया सा
दोपहरी चाहता ।
छगन लाल गर्ग।
भावनाओं मे भी
हर क्षण रहता
विरान मेरा
बन गया हूँ भार
खुद अपना
बिना तुम्हारें
नसीब नहीं जाना
उम्र रहते
सुनना सत्य
मानू कैसे
कि होते भी हो तुम
हर गली
लेती पहनावा
नित नया
नही होता आभास
कि बद्हाली झेल
हुई खुशहाल
कहते सुनता
बडे लोगों के ही
होते हो तुम
घृणा है तुम्हें हमसे
यह सच यदि तो
क्यों रहते
दिल की आशा मे
चेतन बने
हर पल
गहरे निश्वास बन
उभरते सताते
सपने बने
नहीं चाहत
वैभव की
चाहत मात्र
जिने की
कि कभी पलटो
और देखो ना
हमें भी
सर्द हवाओं के
निर्मम झौके
किस कदर सुलाते जाते
असीम नींद की आगोश
मेरे नन्हे से फूल
बिना सौरभ बिखेरे
मिल जाते धूल
ओर मुरझा चुकी
टहनियो मे
नहीं उभर पाते
नवल कपोल
या कि नव कुसुम
श्वासों को
नहीं मिलती
प्राण वायु
बिना तुम्हारे
जीवन जमीन की
उर्वरा मे
विकसित होते जाते
शिला खंडों की
दीवार ताने
विशाल अहं के
नभमापी भवन
अब कहों ना
कब करोगे
हमारी ओर रूख
विवश तो नहीं तुम
हमारी तरह
कि झकडे हो
जंजीरों से
अमीरों की
नहीं सामर्थ्य
कि छूटकारा पाओ
लगता यहीं
बिना जंजीर तोडे
तुम्हारी मुक्ति नहीं
हमारी चेतना ही
तुम्हारी मुक्ति
सूर्य तमतमाया सा
दोपहरी चाहता ।
छगन लाल गर्ग।