Friday, June 10, 2016

आते क्यों नहीं

तुम आते क्यों नहीं
भावनाओं मे भी
हर क्षण रहता
विरान मेरा
बन गया हूँ भार
खुद अपना
बिना तुम्हारें
नसीब नहीं जाना
उम्र रहते
सुनना सत्य
मानू कैसे
कि होते भी हो तुम
हर गली
लेती पहनावा
नित नया
नही होता आभास
कि बद्हाली झेल
हुई खुशहाल
कहते सुनता
बडे लोगों के ही
होते हो तुम
घृणा है तुम्हें हमसे
यह सच यदि तो
क्यों रहते
दिल की आशा मे
चेतन बने
हर पल
गहरे निश्वास बन
उभरते सताते
सपने बने
नहीं चाहत
वैभव की
चाहत मात्र
जिने की
कि कभी पलटो
और देखो ना
हमें भी
सर्द हवाओं के
निर्मम झौके
किस कदर सुलाते जाते
असीम नींद की आगोश
मेरे नन्हे से फूल
बिना सौरभ बिखेरे
मिल जाते धूल
ओर मुरझा चुकी
टहनियो मे
नहीं उभर पाते
नवल कपोल
या कि नव कुसुम
श्वासों को
नहीं मिलती
प्राण वायु
बिना तुम्हारे
जीवन जमीन की
उर्वरा मे
विकसित होते जाते
शिला खंडों की
दीवार ताने
विशाल अहं के
नभमापी भवन
अब कहों ना
कब करोगे
हमारी ओर रूख
विवश तो नहीं तुम
हमारी तरह
कि झकडे हो
जंजीरों से
अमीरों की
नहीं सामर्थ्य
कि छूटकारा पाओ
लगता यहीं
बिना जंजीर तोडे
तुम्हारी मुक्ति नहीं
हमारी चेतना ही
तुम्हारी मुक्ति
सूर्य तमतमाया सा
दोपहरी चाहता ।
छगन लाल गर्ग।