कहां है ज्वर
बढाता हूँ हाथ अपना
निकलती आह को
दबाता हूँ भीतर
कि ना हो इजहार
भीतरी वेदना
ओर भेज देता हूँ
साथ आये पुत्र को
उसकी ड्यूटी पर
ठीक पीछे देखता हूँ
पर्ची के पांच
रुपये का नोट दबाते हाथो
भीड बीच पीचता
कांपता वृद्ध
उसके तन की गर्माहट को
अहसास करता
पहूंचा हूँ पर्ची की खिडकी
मेडिकल डायरी बढाते ही
नर्स मोबाइल संगीत सुनते ही
उठाती है फोन
धडाम की नहीं आवाज
भीड लटका वृद्ध
गिरता है
देखता हूँ भीड घिरी
नही कोई डाक्टर आता
ओर न ही कोई अपना
फोन पर नर्स के हंसी की आवाज
और खिडकी मे झूलता
हाथ मेरा
कही दूर होते जाते मुझसे
एक असहनीय सन्नाटा
उबाल खाता भीतरी ताप
अधिक करता
निकलता हूँ पंक्ति से
देखता हूँ कोई डाक्टर मिले
नही पाता
ओर गहरी निश्वास लिए
बैठता हूँ लंबी छितरी बैंच
जहां सन्नाटा घिरा
नही पता
जिंदगी पसरा सन्नाटा
घना विस्तार पाते।
छगन लाल गर्ग।
बढाता हूँ हाथ अपना
निकलती आह को
दबाता हूँ भीतर
कि ना हो इजहार
भीतरी वेदना
ओर भेज देता हूँ
साथ आये पुत्र को
उसकी ड्यूटी पर
ठीक पीछे देखता हूँ
पर्ची के पांच
रुपये का नोट दबाते हाथो
भीड बीच पीचता
कांपता वृद्ध
उसके तन की गर्माहट को
अहसास करता
पहूंचा हूँ पर्ची की खिडकी
मेडिकल डायरी बढाते ही
नर्स मोबाइल संगीत सुनते ही
उठाती है फोन
धडाम की नहीं आवाज
भीड लटका वृद्ध
गिरता है
देखता हूँ भीड घिरी
नही कोई डाक्टर आता
ओर न ही कोई अपना
फोन पर नर्स के हंसी की आवाज
और खिडकी मे झूलता
हाथ मेरा
कही दूर होते जाते मुझसे
एक असहनीय सन्नाटा
उबाल खाता भीतरी ताप
अधिक करता
निकलता हूँ पंक्ति से
देखता हूँ कोई डाक्टर मिले
नही पाता
ओर गहरी निश्वास लिए
बैठता हूँ लंबी छितरी बैंच
जहां सन्नाटा घिरा
नही पता
जिंदगी पसरा सन्नाटा
घना विस्तार पाते।
छगन लाल गर्ग।