नहीं पहूंच पाता
तुम तक
जग चेतना रहते
उलझाव घेरता
मकडजाल घिरा
मन मस्तिष्क
नहीं होते अचेतन
कैसे आऊं
पदार्थो से घिरा अस्तित्व
घनी संकरी हुई
अचेतन गली
प्राण चाहे निश्छल
बेबूझ बन समाना
असीम संग मिलना
कैसे हो
कहीं दूर क्षितिज
उमड घिर छाया
झंझावत भरा अचेतन
सूझ बूझ बनती शून्य
अचेतन समाया भीतर
डूब डूब हुआ नीर नेह
नहीं पाता स्मरण
नहीं रमते शब्द भी
अधर हुए है निर्जीव
दोहराऊ कैसे प्रियतम
नाम तेरा पावन
लगता हुआ है आरंभ
अज्ञात यात्रा का आगाज
लय राग शब्द विहीन
स्मृति रही है कायम
प्राण बुलाते प्रियतम
विकल पर है विवश
पाया हुआ अपाया
सब बह रहे
ले चली वासना
विलय रे यह कैसा
छूटता अब किनारा
अचेतन बसता प्राण तो
कैसे ना अब मिलना
तुम तक
जग चेतना रहते
उलझाव घेरता
मकडजाल घिरा
मन मस्तिष्क
नहीं होते अचेतन
कैसे आऊं
पदार्थो से घिरा अस्तित्व
घनी संकरी हुई
अचेतन गली
प्राण चाहे निश्छल
बेबूझ बन समाना
असीम संग मिलना
कैसे हो
कहीं दूर क्षितिज
उमड घिर छाया
झंझावत भरा अचेतन
सूझ बूझ बनती शून्य
अचेतन समाया भीतर
डूब डूब हुआ नीर नेह
नहीं पाता स्मरण
नहीं रमते शब्द भी
अधर हुए है निर्जीव
दोहराऊ कैसे प्रियतम
नाम तेरा पावन
लगता हुआ है आरंभ
अज्ञात यात्रा का आगाज
लय राग शब्द विहीन
स्मृति रही है कायम
प्राण बुलाते प्रियतम
विकल पर है विवश
पाया हुआ अपाया
सब बह रहे
ले चली वासना
विलय रे यह कैसा
छूटता अब किनारा
अचेतन बसता प्राण तो
कैसे ना अब मिलना