शब्द अपना अर्थ
खोता जाता
बेअर्थी रह जाती जिंदगी
नहीं समझ पाते
असली हकीकत
अधिक घिसे जा चुके
संवेदना देते शब्द
कि नही निकलती
संवेदना की करूण तपीस
आंख देखा भी
हो जाता छलावा
बहुरुप ले चुकी
अब बनावटी माया
कि विश्वास की हकीकत
कतराने लगी
यथार्थ का असलीपन
होगा शास्वत
यह प्रगति इस काल
पूँजी बन उभरी सभ्य
नहीं होती विस्मृत
भीतर की सहृदयता
यही कारण
कि आज सुनाना चाहता
अभी गुजारा समयांश
पीत वस्त्र धारी
तन्दुरस्त चेहरे से
कहता मुझे अपनी कथनी
रूकता हुआ चलता हूँ
उसकी चाल
घर से बहिस्कृत हुआ
बहु बेटो का निकाला बाप
बताता पछताता
कारण मात्र यही
कि संपति नहीं जुटा सका
ओरो की तरह
पटेल जाति होते भी
नही करते परवाह
उसकी जिये मरे
गहरी श्वास ले कहता
इन कपडो के आसरे
निकल जाय बचे दिन
रूकता हूँ मै
गहरी नजर नहीं दे पाती
असलियत उसकी
शब्द और शक्ल
नहीं कहते सच्चाई
चलो कुछ भी रहा हो
विडंबना का बिंब तो
आकार पाता हूँ भीतर
अपने संवेदना
कुछ पाता हूँ जेब मे
दे देता हूँ
संतुष्टि तो नहीं पर ठीक
बढता हूँ
पर असमझ की अंधेरी
कंदरा की तरफ।
छगन लाल गर्ग।
खोता जाता
बेअर्थी रह जाती जिंदगी
नहीं समझ पाते
असली हकीकत
अधिक घिसे जा चुके
संवेदना देते शब्द
कि नही निकलती
संवेदना की करूण तपीस
आंख देखा भी
हो जाता छलावा
बहुरुप ले चुकी
अब बनावटी माया
कि विश्वास की हकीकत
कतराने लगी
यथार्थ का असलीपन
होगा शास्वत
यह प्रगति इस काल
पूँजी बन उभरी सभ्य
नहीं होती विस्मृत
भीतर की सहृदयता
यही कारण
कि आज सुनाना चाहता
अभी गुजारा समयांश
पीत वस्त्र धारी
तन्दुरस्त चेहरे से
कहता मुझे अपनी कथनी
रूकता हुआ चलता हूँ
उसकी चाल
घर से बहिस्कृत हुआ
बहु बेटो का निकाला बाप
बताता पछताता
कारण मात्र यही
कि संपति नहीं जुटा सका
ओरो की तरह
पटेल जाति होते भी
नही करते परवाह
उसकी जिये मरे
गहरी श्वास ले कहता
इन कपडो के आसरे
निकल जाय बचे दिन
रूकता हूँ मै
गहरी नजर नहीं दे पाती
असलियत उसकी
शब्द और शक्ल
नहीं कहते सच्चाई
चलो कुछ भी रहा हो
विडंबना का बिंब तो
आकार पाता हूँ भीतर
अपने संवेदना
कुछ पाता हूँ जेब मे
दे देता हूँ
संतुष्टि तो नहीं पर ठीक
बढता हूँ
पर असमझ की अंधेरी
कंदरा की तरफ।
छगन लाल गर्ग।