आकार लेता जाता
प्रेम दोगला व्यक्तित्व
कि ढूंढता रहता
भीतर का मर्म
जिसमें छिपता जाता
अनजान दोगलापन
तहे दबती जाती
मोटे मजबूत आवरण तले
अति सूक्षम राह
बहुत मुश्किल भरा
हो जाता काम
शब्द नहीं आते काम
असत्य का खतरा
नहीं डराता उसका
सत्य जितना
प्रेम बदलता करवट
दोगलेपन की ओर
क्षणिक चेतन भरता
पहचान की ऊर्जा
पकडना होता है वहीं पल
असलियत खुलती
उजागर हुआ सत्य
बन जाता सच्चाई
यह कैसा प्रेम
जो बनना चाहता
दोगलेपन की घृणा
देती जाती ईर्ष्या को जन्म
ओर इस दोगलेपन घेरे
ईर्ष्या धुंऐं से
मुश्किल हो जाता
प्रेम ज्योति ढूंढना
इसे समझना
अंतकरण की चुनोति
बन चुका
पल प्रेम भरा घनत्व।
छगन लाल गर्ग।
प्रेम दोगला व्यक्तित्व
कि ढूंढता रहता
भीतर का मर्म
जिसमें छिपता जाता
अनजान दोगलापन
तहे दबती जाती
मोटे मजबूत आवरण तले
अति सूक्षम राह
बहुत मुश्किल भरा
हो जाता काम
शब्द नहीं आते काम
असत्य का खतरा
नहीं डराता उसका
सत्य जितना
प्रेम बदलता करवट
दोगलेपन की ओर
क्षणिक चेतन भरता
पहचान की ऊर्जा
पकडना होता है वहीं पल
असलियत खुलती
उजागर हुआ सत्य
बन जाता सच्चाई
यह कैसा प्रेम
जो बनना चाहता
दोगलेपन की घृणा
देती जाती ईर्ष्या को जन्म
ओर इस दोगलेपन घेरे
ईर्ष्या धुंऐं से
मुश्किल हो जाता
प्रेम ज्योति ढूंढना
इसे समझना
अंतकरण की चुनोति
बन चुका
पल प्रेम भरा घनत्व।
छगन लाल गर्ग।