Thursday, June 9, 2016

नन्हे बच्चे

आंटी दे दो ना रोटी
शब्दों की गूंज
सवेरे सवेरे
उतरती चिरती जीगर
ओर प्रतिक्रिया मे सुनता
फुंफकार मारती
फटकार की आवाज
नित्य का यह श्रवण दृश्य
अंश बन गया
रोज सवेरे का
नन्हे बच्चे
शायद भाई बहन
बुलाता हूँ पास
ठिठक जाती है बच्ची
बच्चा झेपता जाता
आता है पास
संवेदना हो जाती
द्रवित कदमों तले
यथार्थ पाये
बच्चों के
धकेला पीटा जाता
बाप द्वारा उन्हे
ओर इधर
दाताओं से
नहीं समझ पाता
विवश
जीती जिंदगी तुझे
कसूर जीने का।
छगन लाल गर्ग।