बंद दुकानें
सुबह सुबह लेती परीक्षा
धैर्य की
प्रसादी ओर अगरबती
बिना अधूरापन लगता
श्रृद्धा के साथ
अन्यों को बांटना मंदिर की प्रसाद
अच्छा लगता
पर आज नहीं खुली कोई दुकान
थोड़ा जल्द आ पहुँचा
मंदिर निमित्त
ओर नहीं कहीं दिखती
आस पास व्यवस्था
प्रसाद की
खड़ा नहीं रह पाता
दर्द उभरता पिंडलियों का
नहीं रहने देता खड़ा
कि तभी
चौकता आवाज सुनकर
अनजान व्यक्ति
हँसते
कहता नमस्कार सर
गौर से देखने पर भी
नहीं मिलती पहचान
सर मैं स्टूडेन्ट आपका
आपके विनोद का मित्र
चेतना मुडती मेरी
ढूँढती अतीत
एक विस्तार
उठती बेठती लहरों का
झील की
असीम गहराई से
उत्पाद उनका
हाँ एक बालक
मुस्कान भरता
लुढकता
नजरों के वेग समान
झील मे बुलाते
मौत की मनुहार प्रेरित
ओर उसी वेग
पानी से निकले
बच्चे लिऐ दो हाथ
ओर संतोष
आभा से चमकता चेहरा
आता हूँ अतीत
झील से बाहर
ठीक वहीं चेहरा
विशाल तुम हो ना
ओर अति
आत्मिय मुद्रा मे
झूकता उसका तन
आह जीवन अमरता के क्षण
मानव जीवन मे
ऐसे लोगों से ही
मिलते अलौकिक से ।
छगन लाल गर्ग ।
सुबह सुबह लेती परीक्षा
धैर्य की
प्रसादी ओर अगरबती
बिना अधूरापन लगता
श्रृद्धा के साथ
अन्यों को बांटना मंदिर की प्रसाद
अच्छा लगता
पर आज नहीं खुली कोई दुकान
थोड़ा जल्द आ पहुँचा
मंदिर निमित्त
ओर नहीं कहीं दिखती
आस पास व्यवस्था
प्रसाद की
खड़ा नहीं रह पाता
दर्द उभरता पिंडलियों का
नहीं रहने देता खड़ा
कि तभी
चौकता आवाज सुनकर
अनजान व्यक्ति
हँसते
कहता नमस्कार सर
गौर से देखने पर भी
नहीं मिलती पहचान
सर मैं स्टूडेन्ट आपका
आपके विनोद का मित्र
चेतना मुडती मेरी
ढूँढती अतीत
एक विस्तार
उठती बेठती लहरों का
झील की
असीम गहराई से
उत्पाद उनका
हाँ एक बालक
मुस्कान भरता
लुढकता
नजरों के वेग समान
झील मे बुलाते
मौत की मनुहार प्रेरित
ओर उसी वेग
पानी से निकले
बच्चे लिऐ दो हाथ
ओर संतोष
आभा से चमकता चेहरा
आता हूँ अतीत
झील से बाहर
ठीक वहीं चेहरा
विशाल तुम हो ना
ओर अति
आत्मिय मुद्रा मे
झूकता उसका तन
आह जीवन अमरता के क्षण
मानव जीवन मे
ऐसे लोगों से ही
मिलते अलौकिक से ।
छगन लाल गर्ग ।