झिंझोड कर दो चेतना मुझे
बन चुका अब पूरा ठूंठ
नही रही कमनीय कोमलतम
विभोर करती आह्लाद की लहरें
नही रहा सागर
सूखा पडा विस्तार चारों दिशा
पक्की माटी का तन घना काला
जगह जगह तटखता रहा
आ चूकी असीम दरारे
बिना तरावट नही रही चिकनाहट
कि करूं भरोसा
जुडाव होगा फिर एक बार अस्तित्व
घने गहरे मे मिटना चलता लगातार
ओर अचेतन खींचने लगा हुआ आशक्त
नही पाता कही उम्मीदों का शैलाब
आज विकल विसंगति बना
अतिशय विवेक देता गहन भराव
प्रकृति पदार्थ से चाहता सर्वस्व
स्थूल शरीर संग संस्कार करता
अपनी आत्मा का भी
तर्क तुला पर तोलता जाता मानवीयता
क्या हो नही कोई
झंकझोर कर करे चेतन मुझे
कि भीतर फूटे
संवेदनशील मानवीय भाव स्त्रोत
ओर अहसास आये
क्षणभंगुर अस्तित्व का ।
छगन लाल गर्ग ।
बन चुका अब पूरा ठूंठ
नही रही कमनीय कोमलतम
विभोर करती आह्लाद की लहरें
नही रहा सागर
सूखा पडा विस्तार चारों दिशा
पक्की माटी का तन घना काला
जगह जगह तटखता रहा
आ चूकी असीम दरारे
बिना तरावट नही रही चिकनाहट
कि करूं भरोसा
जुडाव होगा फिर एक बार अस्तित्व
घने गहरे मे मिटना चलता लगातार
ओर अचेतन खींचने लगा हुआ आशक्त
नही पाता कही उम्मीदों का शैलाब
आज विकल विसंगति बना
अतिशय विवेक देता गहन भराव
प्रकृति पदार्थ से चाहता सर्वस्व
स्थूल शरीर संग संस्कार करता
अपनी आत्मा का भी
तर्क तुला पर तोलता जाता मानवीयता
क्या हो नही कोई
झंकझोर कर करे चेतन मुझे
कि भीतर फूटे
संवेदनशील मानवीय भाव स्त्रोत
ओर अहसास आये
क्षणभंगुर अस्तित्व का ।
छगन लाल गर्ग ।