Sunday, June 12, 2016

चेतना मुझे

झिंझोड कर दो चेतना मुझे 
बन चुका अब पूरा ठूंठ 
नही रही कमनीय कोमलतम
विभोर करती आह्लाद की लहरें
नही रहा सागर 
सूखा पडा विस्तार चारों दिशा
पक्की माटी का तन घना काला
जगह जगह तटखता रहा
आ चूकी असीम दरारे
बिना तरावट नही रही चिकनाहट
कि करूं भरोसा
जुडाव होगा फिर एक बार अस्तित्व
घने गहरे मे मिटना चलता लगातार
ओर अचेतन खींचने लगा हुआ आशक्त
नही पाता कही उम्मीदों का शैलाब
आज विकल विसंगति बना
अतिशय विवेक देता गहन भराव
प्रकृति पदार्थ से चाहता सर्वस्व
स्थूल शरीर संग संस्कार करता
अपनी आत्मा का भी
तर्क तुला पर तोलता जाता मानवीयता
क्या हो नही कोई
झंकझोर कर करे चेतन मुझे
कि भीतर फूटे
संवेदनशील मानवीय भाव स्त्रोत
ओर अहसास आये
क्षणभंगुर अस्तित्व का ।
छगन लाल गर्ग ।