बदलते मूल्य
हर क्षेत्र
अब नही आता भरोसा
अनुभूति शास्वत बुद्धों के निष्कर्ष
नही रखते साक्षेप मूल्य
मूल्यांकन का मापदंड बदला
अब आदर्शो का आशियाना
हास्यास्पद किवदंती हुआ
नव चेतन पाया अधिक विस्तार
वासनाओं का अपना अहं दबदबा
ओर उसी निर्देश बनाने होते
जीवन जीने के मापदंड
तभी बढती आयु का मालिक बना
आज का मानव भूलने को बाध्य
स्थापित जर्जर परंपरागत मूल्य
अब असभ्य आचरण
नही बरदाश्त योग्य
तत्कालीन दंड संहिता मे होता
तुरंत मुकदमा दर्ज
बडी अजीब हौशियारी आई
आज हर मानव ज्ञान उकेरने को आतुर
तलाश करता नित्य नये श्रोता
अभद्रता सहन कर्ता अब नही होता
संतत्व धारित व्यक्ति
वह होता मुर्खता से भरपूर
बहुत अंतराल पाया
आज का युग नही चाहता
संडास देती प्राचीन विचारधारा
ताजगी पाया युग चाहता
भौतिक सुख का विशालकाय दरिया
कि डूबाई जा सके सारी परंपराऐं ।
छगन लाल गर्ग ।
हर क्षेत्र
अब नही आता भरोसा
अनुभूति शास्वत बुद्धों के निष्कर्ष
नही रखते साक्षेप मूल्य
मूल्यांकन का मापदंड बदला
अब आदर्शो का आशियाना
हास्यास्पद किवदंती हुआ
नव चेतन पाया अधिक विस्तार
वासनाओं का अपना अहं दबदबा
ओर उसी निर्देश बनाने होते
जीवन जीने के मापदंड
तभी बढती आयु का मालिक बना
आज का मानव भूलने को बाध्य
स्थापित जर्जर परंपरागत मूल्य
अब असभ्य आचरण
नही बरदाश्त योग्य
तत्कालीन दंड संहिता मे होता
तुरंत मुकदमा दर्ज
बडी अजीब हौशियारी आई
आज हर मानव ज्ञान उकेरने को आतुर
तलाश करता नित्य नये श्रोता
अभद्रता सहन कर्ता अब नही होता
संतत्व धारित व्यक्ति
वह होता मुर्खता से भरपूर
बहुत अंतराल पाया
आज का युग नही चाहता
संडास देती प्राचीन विचारधारा
ताजगी पाया युग चाहता
भौतिक सुख का विशालकाय दरिया
कि डूबाई जा सके सारी परंपराऐं ।
छगन लाल गर्ग ।