Sunday, June 12, 2016

बदलते मूल्य

बदलते मूल्य 
हर क्षेत्र 
अब नही आता भरोसा 
अनुभूति शास्वत बुद्धों के निष्कर्ष 
नही रखते साक्षेप मूल्य 
मूल्यांकन का मापदंड बदला
अब आदर्शो का आशियाना
हास्यास्पद किवदंती हुआ
नव चेतन पाया अधिक विस्तार
वासनाओं का अपना अहं दबदबा
ओर उसी निर्देश बनाने होते
जीवन जीने के मापदंड
तभी बढती आयु का मालिक बना
आज का मानव भूलने को बाध्य
स्थापित जर्जर परंपरागत मूल्य
अब असभ्य आचरण
नही बरदाश्त योग्य
तत्कालीन दंड संहिता मे होता
तुरंत मुकदमा दर्ज
बडी अजीब हौशियारी आई
आज हर मानव ज्ञान उकेरने को आतुर
तलाश करता नित्य नये श्रोता
अभद्रता सहन कर्ता अब नही होता
संतत्व धारित व्यक्ति
वह होता मुर्खता से भरपूर
बहुत अंतराल पाया
आज का युग नही चाहता
संडास देती प्राचीन विचारधारा
ताजगी पाया युग चाहता
भौतिक सुख का विशालकाय दरिया
कि डूबाई जा सके सारी परंपराऐं ।
छगन लाल गर्ग ।