Sunday, June 12, 2016

आवाज

आवाज वहीं हैं 
पहली बार की नहीं 
कई दफा झकझोरा हैं मुझे 
दौडा दरवाजे देखता हूँ 
हाँ यही तो हैं 
पर इस बार अपंग तन 
हाथ साइकिल सवार हैं 
कहां पायी
जवाब पर झूझलाया
रक्षा बंधन अफसर बेटा आया था 
बहू के पापा ने सिफारिश की थी
बेटे ने दिलवा दी
अब बाबूजी ठीक हैं 
दयावानो से पेट दोनों का 
भर जाता हैं 
हृदय सुन मेरे
क्यों सुनते नहीं 
रक्त संबंधी रिश्तों के हृदय 
ऑखे गिली हुई
आवाज देता हूँ 
चाय रोटी देना
यूँ ही मत जाने देना।