Sunday, June 12, 2016

चल पथिक

चल पथिक कहीं राह खोजे
आज कल का माप खोजे
भावना का राज खोजे
नित नया संसार खोजे
थक मत राह मिली कहां हैं 
ऊठ फिर चले राह कहीं हैं 
ठहरे जीवन कसक घनी हैं 
उन्माद नया ले राह बनी हैं 
हारे तो विलिन होते तुम
जीते पाते विस्तार उतम
वीणा तार रहे विषम सम
टूटे मिल पाये सरगम
राग अधूरा गीत अधूरा
राह बिना काल का घेरा
रोशनी बिना का सवेरा
चल काटे जंगल का फेरा
पथ मिले मिले चल पथिक मेरे 
उबड खाबड वन को राह से भरे
खो ले तेरा मेरा अर्पित आज करे
रहे चलेगे ओरो के हित काम करे
हृदय कसक से फिर जीवन भरे
जिसे हम कहते हैं संताप जीवन 
रहता उसी मे हैं सब सार जीवन 
ईश्वर का वहीं मानव को वरदान
भूले हम सुख सार भरे हैं जीवन