Sunday, June 12, 2016

हम मानव हैं

प्रश्न तो उठते हैं 
मानव होना ही
एक प्रश्न हैं 
उतर नित मिलते हैं 
पर क्या वे निरापद होते हैं 
माप दंड मानव के मन का
क्या कोई बना हैं 
ओर सत्य असत्य की जाँच 
करे तो कैसे 
मामला मन का ठहरा
तथ्यो का सत्यापन सम्भव हैं 
पर भाव
जो आत्मा से तपे हैं 
क्या संशय यहाँ भी
मर्यादा एक शैली हैं 
जीवन नहीं 
यह तो भीतर को जीता हैं 
यंत्र नहीं हैं जीवन 
एक सरिता हैं 
स्वच्छन्द राह प्रवाह चाहिये इसे
बंदिशो का जाल 
मर्यादा तो हैं 
जीवन नहीं हैं 
तो क्या कहूँ 
ठीक था सबकुछ 
मर्यादा पुरोषत राम का जीवन 
वे ब्रह्म हैं 
परमात्मा हैं 
मानव से तुलना
शायद ठीक नहीं 
पर हम मानव 
क्या मापदंड अपनाये
फिर प्रश्न अनुतरित
देव या मानव
या कि जीवन का संश्लेषण 
कह दू
शास्वत आत्म भाव
तुम भरो जीवन 
आये स्नेह 
आये विश्वास
आये सहृदयता संवेदन
संबधो मे आत्म विसर्जन 
शायद राम कथा से ज्यादा 
हमे आत्म भाव चाहिए 
क्योंकि हम मानव हैं