प्रश्न तो उठते हैं
मानव होना ही
एक प्रश्न हैं
उतर नित मिलते हैं
पर क्या वे निरापद होते हैं
माप दंड मानव के मन का
क्या कोई बना हैं
ओर सत्य असत्य की जाँच
करे तो कैसे
मामला मन का ठहरा
तथ्यो का सत्यापन सम्भव हैं
पर भाव
जो आत्मा से तपे हैं
क्या संशय यहाँ भी
मर्यादा एक शैली हैं
जीवन नहीं
यह तो भीतर को जीता हैं
यंत्र नहीं हैं जीवन
एक सरिता हैं
स्वच्छन्द राह प्रवाह चाहिये इसे
बंदिशो का जाल
मर्यादा तो हैं
जीवन नहीं हैं
तो क्या कहूँ
ठीक था सबकुछ
मर्यादा पुरोषत राम का जीवन
वे ब्रह्म हैं
परमात्मा हैं
मानव से तुलना
शायद ठीक नहीं
पर हम मानव
क्या मापदंड अपनाये
फिर प्रश्न अनुतरित
देव या मानव
या कि जीवन का संश्लेषण
कह दू
शास्वत आत्म भाव
तुम भरो जीवन
आये स्नेह
आये विश्वास
आये सहृदयता संवेदन
संबधो मे आत्म विसर्जन
शायद राम कथा से ज्यादा
हमे आत्म भाव चाहिए
क्योंकि हम मानव हैं ।
मानव होना ही
एक प्रश्न हैं
उतर नित मिलते हैं
पर क्या वे निरापद होते हैं
माप दंड मानव के मन का
क्या कोई बना हैं
ओर सत्य असत्य की जाँच
करे तो कैसे
मामला मन का ठहरा
तथ्यो का सत्यापन सम्भव हैं
पर भाव
जो आत्मा से तपे हैं
क्या संशय यहाँ भी
मर्यादा एक शैली हैं
जीवन नहीं
यह तो भीतर को जीता हैं
यंत्र नहीं हैं जीवन
एक सरिता हैं
स्वच्छन्द राह प्रवाह चाहिये इसे
बंदिशो का जाल
मर्यादा तो हैं
जीवन नहीं हैं
तो क्या कहूँ
ठीक था सबकुछ
मर्यादा पुरोषत राम का जीवन
वे ब्रह्म हैं
परमात्मा हैं
मानव से तुलना
शायद ठीक नहीं
पर हम मानव
क्या मापदंड अपनाये
फिर प्रश्न अनुतरित
देव या मानव
या कि जीवन का संश्लेषण
कह दू
शास्वत आत्म भाव
तुम भरो जीवन
आये स्नेह
आये विश्वास
आये सहृदयता संवेदन
संबधो मे आत्म विसर्जन
शायद राम कथा से ज्यादा
हमे आत्म भाव चाहिए
क्योंकि हम मानव हैं ।