ओर सहारा लेता रहा
विवश हो जाता
बिना तुम्हारे
अधूरेपन का अहसास
तोडता मुझे विकल करता हैं
उन पलो को शब्द कैसे दू
कितने मेरे
कि लगता यही हूँ मैं समूचा
इन्ही से गढा
इनका बनाया
अस्तित्व इनका हूँ
प्यार करते मेरे शिष्य
कहां लगता था
कि वक्त के दौराहे पर हैं
अस्तित्व मेरा
जहाँ राह बदलनी होती हैं
मर्जी नहीं चलती इसमे
कि भावना जीते
धक्का हैं यह
जिसे झेलना नियति हमारी
साथी अब स्मृति बने से
हमदर्दी देते हैं
ओर यह हमदर्दी
कठोर प्रहार बनी सी
मेरी पीर बनी हैं
कहां हैं ऐसे मे आभार के शब्द
जो मेरे हो
सहारा लेता मेरे कवि तेरा
एक तुम हो कि
साथ जीवन प्रयन्त निभाते जाते
इन पलो का
जिनका नहीं कोई हमदर्द
केवल तुम तुम ही
बनते सहारा
ओर मै सहारा लेता रहता हूँ ।
छगन लाल गर्ग।
विवश हो जाता
बिना तुम्हारे
अधूरेपन का अहसास
तोडता मुझे विकल करता हैं
उन पलो को शब्द कैसे दू
कितने मेरे
कि लगता यही हूँ मैं समूचा
इन्ही से गढा
इनका बनाया
अस्तित्व इनका हूँ
प्यार करते मेरे शिष्य
कहां लगता था
कि वक्त के दौराहे पर हैं
अस्तित्व मेरा
जहाँ राह बदलनी होती हैं
मर्जी नहीं चलती इसमे
कि भावना जीते
धक्का हैं यह
जिसे झेलना नियति हमारी
साथी अब स्मृति बने से
हमदर्दी देते हैं
ओर यह हमदर्दी
कठोर प्रहार बनी सी
मेरी पीर बनी हैं
कहां हैं ऐसे मे आभार के शब्द
जो मेरे हो
सहारा लेता मेरे कवि तेरा
एक तुम हो कि
साथ जीवन प्रयन्त निभाते जाते
इन पलो का
जिनका नहीं कोई हमदर्द
केवल तुम तुम ही
बनते सहारा
ओर मै सहारा लेता रहता हूँ ।
छगन लाल गर्ग।