Monday, June 13, 2016

आवाजे

बैठा तो हूँ आवाजे आती
टकराती चेतना से
अस्वीकृति पाती लौटती
यह मैं तो हूँ नहीं 
जो प्रभावित वक्ता को नकारू
भीतर तह कहां मानती
कहा प्रतिष्ठित प्रवचनो का
बाहरी व्यक्तित्व मेरा
नतमस्तक हुआ 
एकाग्रता दिखाता हर शब्द की
भाव भंगीमा को स्वीकरता सा
आरोह अवरोह साथ 
क्रिया उसी अनुरूप देता
ओर वक्ता की मीठी नजर का
उपहार पाती
पर यह असंस्कारित हृदय 
बार बार उपेक्षा से भरा भरा
अवबोध ग्राह्यता मे बाधक बना 
खडा हैं 
अब क्या हो इसका
रूकावट बडो की पहचान मे
बाधा सा
जो हैं मेरा अपना
कहता बेशर्म बस करो अब
सुनना प्रवचन
असली जिन्दगी से प्रस्तुत प्रवचनो का
अन्तराल अधिक हैं 
जोखिम हैं यह 
अभी हिलता मुग्ध चेहरा तुम्हारा
गहरे विषाद की पृष्ठ भूमि हैं 
जज्बाती बातें जहाँ कहीं भी सुनो 
सावधान रहो
कहीं आफत बनें जिन्दगी की
असलियत यही 
केवल जमीनी हकीकत ही सुने
शायद जीने का आसरा 
वहीं हो।
फिसलन हीन ठावस भरा
जीवन का राह।
छगन लाल गर्ग।