Monday, June 13, 2016

गहरी आस्था

अब कहोगे आस्था 
तोडते अधर्मी तुम 
माँ का इसी बहाने 
नाम तो मिलता सुनने को
गरबे माता जी की
आस्था के चलायमान 
चलते झुमते चित्र 
आनन्द दायक भक्ति परक
मन आस्था से झुमता
आनन्द से होता लबालब
एक वातावरण भक्ति मय
जीवन का ईश्वरीय साक्षात्कार 
श्रृद्धा से विभोर
आध्यात्मिक आभा का
साक्षात्कार 
जीवन रहते केवल यही पाता
जहाँ संगीत 
जहाँ नृत्य की मदहोशी
ओर कहां 
फिर गुजराती के कोमल
गदराये महक देते शब्द 
लय की वहीं सरलता भरी महक
झुमने का दुर्लभ अवसर
पर खेद केवल यह
कि सभ्यता की ताक झाक
यहाँ भी बढ़ी हैं 
कुत्चितता के
गंदले कीड़े निरन्तर प्रगति पर हैं 
यह प्रगति 
सालती जजबात 
सालती श्रृद्धा गहरी आस्था 
भी हैं
छगन लाल गर्ग।