मित्रो असमझ ही कहूँ अपनी
विकल दशा का अभ्यस्त घना
कसीस तौडती हैं भीतर ही भीतर
छटपटाहट रह रहकर अंकुरित होने का चाहती सुराख
कि कहीं बहाव हो
समतल जमीन मिले कि बहू अविरल
उफान नहीं मंथर मंथर तल आद्र हो निर्मल रस से
ओर सोखे मुझे अस्तित्व लेकर
यह धरा
कुछ नया जन्मे अंकुर ले
पल्लवित हुआ सा इठलाये मादक सुगंध लिऐ
कि फैल फैल जाये चारों दिशा नव कुसुम सी सुरभित पवन
मेरे संचित अनुभव लिए बहे हवा निखरे समा
जहाँ तमाम दर्द इकजाई हुए भरे झोली मेरी
ओर मैं बहू तपन का सार लिए गुंजाइश लिए
यह वेदना जीवन नहीं भाव हैं प्राण हैं
जिसमें शक्ति भरी ब्रह्माण्ड संरचना की
जहाँ नित्य नवीन कुसुम अंकुरित हुए खुशबू देते अंनन्त की
पारमार्थिक शात्विक जीवन दायी
गहराई अनन्त हैं इस पीर पाये जीवन की
शब्दों की औकात थकी थकी
निरह विवश होती जीवन समेट पाये
सृजक मेरे
अभ्यास के अवसर तक सिमटा जीवन हमारा
अन्यथा हमारे सृजन सपने अधूरे अधूरे जीते कैसे
शब्दों का यह चमत्कार मात्र
बिना विकल दशा के बोझ ही होता
जिसे हम अनवरत डूबे बिना ढोते हैं
ढोते हैं ।
छगन लाल गर्ग।
विकल दशा का अभ्यस्त घना
कसीस तौडती हैं भीतर ही भीतर
छटपटाहट रह रहकर अंकुरित होने का चाहती सुराख
कि कहीं बहाव हो
समतल जमीन मिले कि बहू अविरल
उफान नहीं मंथर मंथर तल आद्र हो निर्मल रस से
ओर सोखे मुझे अस्तित्व लेकर
यह धरा
कुछ नया जन्मे अंकुर ले
पल्लवित हुआ सा इठलाये मादक सुगंध लिऐ
कि फैल फैल जाये चारों दिशा नव कुसुम सी सुरभित पवन
मेरे संचित अनुभव लिए बहे हवा निखरे समा
जहाँ तमाम दर्द इकजाई हुए भरे झोली मेरी
ओर मैं बहू तपन का सार लिए गुंजाइश लिए
यह वेदना जीवन नहीं भाव हैं प्राण हैं
जिसमें शक्ति भरी ब्रह्माण्ड संरचना की
जहाँ नित्य नवीन कुसुम अंकुरित हुए खुशबू देते अंनन्त की
पारमार्थिक शात्विक जीवन दायी
गहराई अनन्त हैं इस पीर पाये जीवन की
शब्दों की औकात थकी थकी
निरह विवश होती जीवन समेट पाये
सृजक मेरे
अभ्यास के अवसर तक सिमटा जीवन हमारा
अन्यथा हमारे सृजन सपने अधूरे अधूरे जीते कैसे
शब्दों का यह चमत्कार मात्र
बिना विकल दशा के बोझ ही होता
जिसे हम अनवरत डूबे बिना ढोते हैं
ढोते हैं ।
छगन लाल गर्ग।