Saturday, June 11, 2016

विकल दशा

मित्रो असमझ ही कहूँ अपनी 
विकल दशा का अभ्यस्त घना
कसीस तौडती हैं भीतर ही भीतर 
छटपटाहट रह रहकर अंकुरित होने का चाहती सुराख
कि कहीं बहाव हो 
समतल जमीन मिले कि बहू अविरल 
उफान नहीं मंथर मंथर तल आद्र हो निर्मल रस से
ओर सोखे मुझे अस्तित्व लेकर
यह धरा 
कुछ नया जन्मे अंकुर ले
पल्लवित हुआ सा इठलाये मादक सुगंध लिऐ
कि फैल फैल जाये चारों दिशा नव कुसुम सी सुरभित पवन
मेरे संचित अनुभव लिए बहे हवा निखरे समा
जहाँ तमाम दर्द इकजाई हुए भरे झोली मेरी
ओर मैं बहू तपन का सार लिए गुंजाइश लिए
यह वेदना जीवन नहीं भाव हैं प्राण हैं 
जिसमें शक्ति भरी ब्रह्माण्ड संरचना की
जहाँ नित्य नवीन कुसुम अंकुरित हुए खुशबू देते अंनन्त की
पारमार्थिक शात्विक जीवन दायी
गहराई अनन्त हैं इस पीर पाये जीवन की
शब्दों की औकात थकी थकी 
निरह विवश होती जीवन समेट पाये
सृजक मेरे 
अभ्यास के अवसर तक सिमटा जीवन हमारा
अन्यथा हमारे सृजन सपने अधूरे अधूरे जीते कैसे 
शब्दों का यह चमत्कार मात्र 
बिना विकल दशा के बोझ ही होता 
जिसे हम अनवरत डूबे बिना ढोते हैं 
ढोते हैं
छगन लाल गर्ग।