जीना क्या बेहोशी हैं
अनभिज्ञ हुआ सा खुद से
कि पहचान पाऊ क्या कहूँ खुद को
क्या नाम दे दू कुछ शालिन गरिमा से भरा
ओर छपवा दू इस्तहार या कि पोस्टर
किसी पारंगत चित्रकार से
तडप हैं ख्याति की
आज का सत्य बस यही इसी के इर्द गिर्द सिमटा
जी रहा अपने को भूला बेहोशी के दौर का
पहचान तलाशता मानव
बढता नित अस्तित्व पहचान की दिशा
बिना मनुष्य बने ।
छगन लाल गर्ग।
अनभिज्ञ हुआ सा खुद से
कि पहचान पाऊ क्या कहूँ खुद को
क्या नाम दे दू कुछ शालिन गरिमा से भरा
ओर छपवा दू इस्तहार या कि पोस्टर
किसी पारंगत चित्रकार से
तडप हैं ख्याति की
आज का सत्य बस यही इसी के इर्द गिर्द सिमटा
जी रहा अपने को भूला बेहोशी के दौर का
पहचान तलाशता मानव
बढता नित अस्तित्व पहचान की दिशा
बिना मनुष्य बने ।
छगन लाल गर्ग।