Saturday, June 11, 2016

अंतर मेरे

अंतर मेरे हारा थका 
वापसी चाहता हूँ तेरे भीतर 
अलगाव अंतराल अब विलुप्त हुआ 
पहुँचा हूँ पास द्वार जिसे छोड़ा कभी 
तुम्हारे पुकार 
बार बार वापसी की 
सुनी अनसुनी करता रहा
जीवन के उतराफाल्गुनी नक्षत्र आने तक
मैं ही हूँ अजनबी मत बनो
खोलो खटखटाता हूँ द्वार तेरे
भीचे भीचे लगते अब मुझे 
जैसे युगों से चेतना के द्वार बंद हो
खडा हूँ मेरे चेतन भीतर के
अजनबी मेहमान की तरह पहचान खोये
सुनो मेरी आवाज वहीं जो कभी तेरी रही
आस बान्धे पुकारता तुझे 
कि आवाज पहुँच घुल मिल जाय भीतर तक
सामर्थ्य की सम्पूर्ण क्षमता लिए 
क्रिया का समूचा बल लिए देता हूँ आवाज 
कि भीतर के बंद कपाट खुले
चेतना जागे ओर रश्मिया बिखरे 
घने अंधकार का आदी जीवन मेरा
रसा बसा क्षणिक सुखो के काल्पनिक मोहपाश मे
भ्रामक रस सागर मे इतराया मदमार रहा
मेरे चेतन तुम्हारा टिमटिमया रश्मि कतरा कई बार 
कल्पना के उस घने तिमिर भी
पर हर बार बंद ऑखो से परहेज करता रहा तुमसे 
कभी ऑख खुले पल पाना चाहा समाना सहा अस्तित्व 
कि भीतर विशाल कालिमा भरा तिमिर का आवेग 
मुझे समुचे अस्तित्व सहित ले बहा अपने बहाव अपनी गति 
निर्मल कोरे चित तल को बार बार 
दागित करता रहा जीता रहा
वितृष्णा का हल्का सा तिनका अंधेरे चित टकराया कभी 
पर यह चेतन दशा केवल कहने की आधी अधूरी 
यह झंझावत भार चित झेलता रहा वासना का
ओर मेरे चेतन मैं डूबा डूबा रहा नित
गहन अंधेरे की असीम कंद्राओ मे
जहां मात्र गहरे गर्त डूबना ही नियति हैं 
मन प्राण जख्म पाये आया हूँ मेरे चेतन 
क्या द्वार खोलोगे 
मना मत कर देना अस्तित्व रहा कहां 
केवल विसर्जन चाहता हूँ 
द्वार खोलो ना अब यह
देरी ही मेरी कसक वेदना हैं 
सुनता हूँ बहुत दुर मंदिर के घंटो के स्वर घने हुए हैं 
वातावरण एकरस एक लय एकराग हुआ हैं 
प्रार्थना के स्वर भीतर से गूँजते सृष्टि समाते हैं 
विस्मृत हुआ मैं चेतना क्या तुम हो।
छगन लाल गर्ग।