अंतर मेरे हारा थका
वापसी चाहता हूँ तेरे भीतर
अलगाव अंतराल अब विलुप्त हुआ
पहुँचा हूँ पास द्वार जिसे छोड़ा कभी
तुम्हारे पुकार
बार बार वापसी की
सुनी अनसुनी करता रहा
जीवन के उतराफाल्गुनी नक्षत्र आने तक
मैं ही हूँ अजनबी मत बनो
खोलो खटखटाता हूँ द्वार तेरे
भीचे भीचे लगते अब मुझे
जैसे युगों से चेतना के द्वार बंद हो
खडा हूँ मेरे चेतन भीतर के
अजनबी मेहमान की तरह पहचान खोये
सुनो मेरी आवाज वहीं जो कभी तेरी रही
आस बान्धे पुकारता तुझे
कि आवाज पहुँच घुल मिल जाय भीतर तक
सामर्थ्य की सम्पूर्ण क्षमता लिए
क्रिया का समूचा बल लिए देता हूँ आवाज
कि भीतर के बंद कपाट खुले
चेतना जागे ओर रश्मिया बिखरे
घने अंधकार का आदी जीवन मेरा
रसा बसा क्षणिक सुखो के काल्पनिक मोहपाश मे
भ्रामक रस सागर मे इतराया मदमार रहा
मेरे चेतन तुम्हारा टिमटिमया रश्मि कतरा कई बार
कल्पना के उस घने तिमिर भी
पर हर बार बंद ऑखो से परहेज करता रहा तुमसे
कभी ऑख खुले पल पाना चाहा समाना सहा अस्तित्व
कि भीतर विशाल कालिमा भरा तिमिर का आवेग
मुझे समुचे अस्तित्व सहित ले बहा अपने बहाव अपनी गति
निर्मल कोरे चित तल को बार बार
दागित करता रहा जीता रहा
वितृष्णा का हल्का सा तिनका अंधेरे चित टकराया कभी
पर यह चेतन दशा केवल कहने की आधी अधूरी
यह झंझावत भार चित झेलता रहा वासना का
ओर मेरे चेतन मैं डूबा डूबा रहा नित
गहन अंधेरे की असीम कंद्राओ मे
जहां मात्र गहरे गर्त डूबना ही नियति हैं
मन प्राण जख्म पाये आया हूँ मेरे चेतन
क्या द्वार खोलोगे
मना मत कर देना अस्तित्व रहा कहां
केवल विसर्जन चाहता हूँ
द्वार खोलो ना अब यह
देरी ही मेरी कसक वेदना हैं
सुनता हूँ बहुत दुर मंदिर के घंटो के स्वर घने हुए हैं
वातावरण एकरस एक लय एकराग हुआ हैं
प्रार्थना के स्वर भीतर से गूँजते सृष्टि समाते हैं
विस्मृत हुआ मैं चेतना क्या तुम हो।
छगन लाल गर्ग।
वापसी चाहता हूँ तेरे भीतर
अलगाव अंतराल अब विलुप्त हुआ
पहुँचा हूँ पास द्वार जिसे छोड़ा कभी
तुम्हारे पुकार
बार बार वापसी की
सुनी अनसुनी करता रहा
जीवन के उतराफाल्गुनी नक्षत्र आने तक
मैं ही हूँ अजनबी मत बनो
खोलो खटखटाता हूँ द्वार तेरे
भीचे भीचे लगते अब मुझे
जैसे युगों से चेतना के द्वार बंद हो
खडा हूँ मेरे चेतन भीतर के
अजनबी मेहमान की तरह पहचान खोये
सुनो मेरी आवाज वहीं जो कभी तेरी रही
आस बान्धे पुकारता तुझे
कि आवाज पहुँच घुल मिल जाय भीतर तक
सामर्थ्य की सम्पूर्ण क्षमता लिए
क्रिया का समूचा बल लिए देता हूँ आवाज
कि भीतर के बंद कपाट खुले
चेतना जागे ओर रश्मिया बिखरे
घने अंधकार का आदी जीवन मेरा
रसा बसा क्षणिक सुखो के काल्पनिक मोहपाश मे
भ्रामक रस सागर मे इतराया मदमार रहा
मेरे चेतन तुम्हारा टिमटिमया रश्मि कतरा कई बार
कल्पना के उस घने तिमिर भी
पर हर बार बंद ऑखो से परहेज करता रहा तुमसे
कभी ऑख खुले पल पाना चाहा समाना सहा अस्तित्व
कि भीतर विशाल कालिमा भरा तिमिर का आवेग
मुझे समुचे अस्तित्व सहित ले बहा अपने बहाव अपनी गति
निर्मल कोरे चित तल को बार बार
दागित करता रहा जीता रहा
वितृष्णा का हल्का सा तिनका अंधेरे चित टकराया कभी
पर यह चेतन दशा केवल कहने की आधी अधूरी
यह झंझावत भार चित झेलता रहा वासना का
ओर मेरे चेतन मैं डूबा डूबा रहा नित
गहन अंधेरे की असीम कंद्राओ मे
जहां मात्र गहरे गर्त डूबना ही नियति हैं
मन प्राण जख्म पाये आया हूँ मेरे चेतन
क्या द्वार खोलोगे
मना मत कर देना अस्तित्व रहा कहां
केवल विसर्जन चाहता हूँ
द्वार खोलो ना अब यह
देरी ही मेरी कसक वेदना हैं
सुनता हूँ बहुत दुर मंदिर के घंटो के स्वर घने हुए हैं
वातावरण एकरस एक लय एकराग हुआ हैं
प्रार्थना के स्वर भीतर से गूँजते सृष्टि समाते हैं
विस्मृत हुआ मैं चेतना क्या तुम हो।
छगन लाल गर्ग।