Saturday, June 11, 2016

संगीत राग

नहीं भाता संगीत राग
बजता हुआ रेडियो 
उभरते स्वर धक्का देते सम्पूर्ण चित
अचकचाता सुनना नियति बनी 
अब लगता तोड़ फोड देंगे भीतरी राग 
जो चित भरी निर्मल नेह झील गहन
खिलते जहां सपनों के कुसुम
नित नया सौन्दर्य लिए
पराग कण केसर बने विचरते सम्पूर्ण अस्तित्व 
मिट मिट जाते दबे से दमित राग भाव सारे 
यह संगीत राग उथला उथला बेचैनी भरा
वह राग हैं कहां 
जोडता जीवन के सुर
दर्शन जीवन बनता जीता जागता संगीत राग
अब वह नही रहा
यादों की खाई मे सोया पड़ा हैं 
वक्त की रफ्तार ने दबोचा हैं उसे 
मिटते अरमानो की तरह
अब संगीत भी घनी भीड़ सा
ऊहापोह भरा जीवन जीता
विकल हुआ सा विवश हूँ संगीत झेल जीने को
ओर यह भीतरी चित तन्हाई की अनुभूति पाता
लिपटना चाहता खोये सुरों से
जिसमें राग मेरा रहा जीवन मेरा रहा
इस अंधी दौड़ का गुजरा वक्त हूँ मैं 
जिसे मुँह उठाने की इजाजत नहीं 
मात्र विस्मृतियो की घनी कालिमा मे
मौन साधे सोते रहने की इजाजत हैं 
यान्त्रिक मानव का यह युग
जो तन सार जीता हैं 
नाम बदलाव चाहता युग मनुष्य का
शायद अंतिम दौर मानव रहने का
फिर तो रौबर्ट बने जीना ही
आज के युग का सत्य हैं
छगन लाल गर्ग।