Saturday, June 11, 2016

पुनरूक्ति सच

पुनरूक्ति सच हैं 
यह अनुभव झुठ कैसे करोगे
हिम्मत सच की कहां कि सामना करें 
शून्य हुआ सच क्या कभी उभरेगा
या कि परत दर परत झूठ चालाकी से मुस्काता हुआ 
यूँ ही रौदता अपनी अहंकार की चादर फैलाता रहेगा
चेतना विलुप्त सी निरह 
कंपता सा विश्वास 
विवेक धूमिल यह जीवन अंतिम श्वास तक 
क्या चेतना शून्य रहेगा 
ओर विध्वंसक शक्तिया 
जोर शोर से अपनी विकृत 
पुनरूक्तियो तले सत्य को रौदती रहेगी
सत्य की चेतना आये भी कैसे 
हमारे सपने ही हमारी सच्चाई बने हैं 
सपनो ने सत्य की आकृति बनायी हैं 
ओर हम स्वयं सपनो संग आत्मसात
सत्य नकारते
हौश कहां मुझे चलता हूँ भीड़ संग
सपने लिए झूठी पुनरूक्ति बोझ तले दबा दबा
यह अतृप्त लालसा वासना बाँधती नित्य मुझे 
असत्य के अंधे बियावन मे
चलता तो हूँ पर यह भीड़ भरा असत्य का संग
क्या सार्थक होगा मेरा चलना
या कि मेरा जीवन 
हौश आना बाकी हैं शायद जीवन रहते आये।
छगन लाल गर्ग।