कहता रहूँगा
बिना ताजगी जर्जर तन मन लिए
चिर सत्य
समय की धार काटती नहीं अशक्त रह जाती
कटे कहां सत्य फिर फिर नये रूपो मे घेरते जाते समूचा व्यक्तित्व मेरा
उम्र कहां रही कि संघर्ष कर पछाडू सत्य सारे
ओर बनू विजेता नये शब्द के अवतार साथ
बोलता हूँ शब्दों को
कई बार जुबान घसीटे गये हैं मेरे भी ओरो के द्वारा भी
ताजगी कहां रह गयी मेरी तरह
शब्द ओर उसका प्रभाव समझे कि उम्र गुजरती सी हैं
मुट्ठी भर हवा को संजोने सरकती फिसलती रैगती जिन्दगी मेरी
हकीकत हूँ मैं समय की मार का
एक निछोडे नीम्बू सा सत्य
किमत हीन फिर भी खटास देता हूँ सत्य की
कि किसी के देह रूपी बर्तन मंझे
चमके ओर निखर निखर जाय
पावन सार्थक मानवता बन जग रोशन करे।
छगन लाल गर्ग ।
बिना ताजगी जर्जर तन मन लिए
चिर सत्य
समय की धार काटती नहीं अशक्त रह जाती
कटे कहां सत्य फिर फिर नये रूपो मे घेरते जाते समूचा व्यक्तित्व मेरा
उम्र कहां रही कि संघर्ष कर पछाडू सत्य सारे
ओर बनू विजेता नये शब्द के अवतार साथ
बोलता हूँ शब्दों को
कई बार जुबान घसीटे गये हैं मेरे भी ओरो के द्वारा भी
ताजगी कहां रह गयी मेरी तरह
शब्द ओर उसका प्रभाव समझे कि उम्र गुजरती सी हैं
मुट्ठी भर हवा को संजोने सरकती फिसलती रैगती जिन्दगी मेरी
हकीकत हूँ मैं समय की मार का
एक निछोडे नीम्बू सा सत्य
किमत हीन फिर भी खटास देता हूँ सत्य की
कि किसी के देह रूपी बर्तन मंझे
चमके ओर निखर निखर जाय
पावन सार्थक मानवता बन जग रोशन करे।
छगन लाल गर्ग ।