सब अंग शिथिल से होते हैं ।
कोमल कान्त मधु छलकते हैं ।
तन सिमटता लाज खुद घेरे हैं ।
शब्द प्रिय भीतर तल बसते हैं ।।
यह अर्पण पल का मोहक जादू हैं ।
संसार अरमान का परम मिलन हैं ।
चेतना का अनुपम संग विसर्जन हैं ।
मादक अभिचार पारावार मंथन हैं ।।
इस मंथन मे कुछ ओर नहीं केवल एक सत्य निकलता हैं ।
तन मन विलय हो घना संसार असीम सुखमय लगता हैं ।
जब इस सुख का करते तोल मोल स्वयं तुला ही तुलती हैं ।
अहो भाव हृदय जब घीरता हैं प्रभु रसमय प्रार्थना होती हैं ।।
छगन लाल गर्ग।
कोमल कान्त मधु छलकते हैं ।
तन सिमटता लाज खुद घेरे हैं ।
शब्द प्रिय भीतर तल बसते हैं ।।
यह अर्पण पल का मोहक जादू हैं ।
संसार अरमान का परम मिलन हैं ।
चेतना का अनुपम संग विसर्जन हैं ।
मादक अभिचार पारावार मंथन हैं ।।
इस मंथन मे कुछ ओर नहीं केवल एक सत्य निकलता हैं ।
तन मन विलय हो घना संसार असीम सुखमय लगता हैं ।
जब इस सुख का करते तोल मोल स्वयं तुला ही तुलती हैं ।
अहो भाव हृदय जब घीरता हैं प्रभु रसमय प्रार्थना होती हैं ।।
छगन लाल गर्ग।