होश आता कहां मुझे
बाहर की दुनिया रहते
ऑखे देखती
वह भी स्वीकार्य क्यों हो
राग हैं कहां
जिसे तलाश हो अपने
रोम रोम बहते राग की
विडंबना झेलता मेरा जीवन
गहरी या कि सार हीन
तथ्य खोजता जीवन
उलझता जाता
तथ्यों के घने बियावन मे
भटक भटक जाता
संचित ज्ञान या कि विश्वास
डूबता उतराता
जीवन के हिचकोले खाता सा
अथाह ज्ञान सागर की
लहरों संग
ढूँढता जाता अपना अंश
वहीं जिससे मैं बना
निर्मित हुआ अस्तित्व मेरा
कहां ढूँढ पाया
भ्रमित सा
विवश जीवन मेरा
मान्यताये जीवन को
रोदती हैं प्रति पल
क्षण क्षण
कहां सोचती अन्तर्घट मे
विश्रान्त अलसाये से
लेते सहारा शब्द सागर का
जो सलीके से
जमे जमाये हैं
सहारा हैं वे
सत्य तलाश का
असल तो मेरा भीतरी सच ही
जिसे मैं जीता
जिसे भुगता
ओर तैयारी आगे की
जीने की राह तलाश की
जारी हैं
ओर सत्य यह भी
चेतना शब्द हीन हैं
भीतरी हैं ।
छगन लाल गर्ग।
बाहर की दुनिया रहते
ऑखे देखती
वह भी स्वीकार्य क्यों हो
राग हैं कहां
जिसे तलाश हो अपने
रोम रोम बहते राग की
विडंबना झेलता मेरा जीवन
गहरी या कि सार हीन
तथ्य खोजता जीवन
उलझता जाता
तथ्यों के घने बियावन मे
भटक भटक जाता
संचित ज्ञान या कि विश्वास
डूबता उतराता
जीवन के हिचकोले खाता सा
अथाह ज्ञान सागर की
लहरों संग
ढूँढता जाता अपना अंश
वहीं जिससे मैं बना
निर्मित हुआ अस्तित्व मेरा
कहां ढूँढ पाया
भ्रमित सा
विवश जीवन मेरा
मान्यताये जीवन को
रोदती हैं प्रति पल
क्षण क्षण
कहां सोचती अन्तर्घट मे
विश्रान्त अलसाये से
लेते सहारा शब्द सागर का
जो सलीके से
जमे जमाये हैं
सहारा हैं वे
सत्य तलाश का
असल तो मेरा भीतरी सच ही
जिसे मैं जीता
जिसे भुगता
ओर तैयारी आगे की
जीने की राह तलाश की
जारी हैं
ओर सत्य यह भी
चेतना शब्द हीन हैं
भीतरी हैं ।
छगन लाल गर्ग।