आवाज देते हो
सुनता हूँ विवश हूँ मैं
प्रति आवाज मेरी
शक्ति हीन हैं
पीर घनी अनछुई रह जाती
ओर मैं हर बार बल लगाता
चिखता रह जाता
न मैं ही
न मेरी आवाज भी
पहुँचते तुम तक
व्याकुल सा
स्वप्नवत हैं
यह जीना
लगता मैं हूँ या
कि केवल छाया
जो हर किसी आसरे
चलती ठहरती हैं
मुझे फक्त एक पल दो न
कि बोध पाऊ मेरा
केवल सबूत तो दो
कि अहसास हो
जिन्दा हूँ
नहा उठा घना
विरह आकुल पीडा
पारावर बीच
कब तक नहाऊ
किनारा तो दो
मत घेरो मुझे घनी सृमतिया
कि पहेलु न बदल पाऊ
दर्द एक करवट का
असीम बना हैं
ओर जीवन भी तो
ससीम मेरा
कैसे होगा कि
जीवन रहे
उपाय मेरा जीने का
मत छिनो
आवाज सुनो
दर्द राग
गहरे भीतर का हैं
मेरे सृजक
अभिव्यक्ति ढंग बदलता हूँ
शायद आवाज पहुँचे।
छगन लाल गर्ग ।
सुनता हूँ विवश हूँ मैं
प्रति आवाज मेरी
शक्ति हीन हैं
पीर घनी अनछुई रह जाती
ओर मैं हर बार बल लगाता
चिखता रह जाता
न मैं ही
न मेरी आवाज भी
पहुँचते तुम तक
व्याकुल सा
स्वप्नवत हैं
यह जीना
लगता मैं हूँ या
कि केवल छाया
जो हर किसी आसरे
चलती ठहरती हैं
मुझे फक्त एक पल दो न
कि बोध पाऊ मेरा
केवल सबूत तो दो
कि अहसास हो
जिन्दा हूँ
नहा उठा घना
विरह आकुल पीडा
पारावर बीच
कब तक नहाऊ
किनारा तो दो
मत घेरो मुझे घनी सृमतिया
कि पहेलु न बदल पाऊ
दर्द एक करवट का
असीम बना हैं
ओर जीवन भी तो
ससीम मेरा
कैसे होगा कि
जीवन रहे
उपाय मेरा जीने का
मत छिनो
आवाज सुनो
दर्द राग
गहरे भीतर का हैं
मेरे सृजक
अभिव्यक्ति ढंग बदलता हूँ
शायद आवाज पहुँचे।
छगन लाल गर्ग ।