लौट रहा धीरे से
अपने खुद के स्वभाव में
बहुत दुर हो चुका
अपने आप से
नही पहचान पाता अपना ही मूल
यह होना भी
एक जरूरत बनकर उभरी
जीने निमित्त
कर्तव्य निर्वहन निमित्त
अहसास करना
शायद अब अधिक ठीक होगा
बचना उघडना सब समय का खेल
कंधे ठीक रहेगे खुद के
अस्वाभाविक रूतबा जिया
हैसियत को दबाकर
शायद अस्वीकार कर
कडप लिए कपडे की तरह
किये रहा ईस्त्री
नही रखी सलवटे धार दार रहा
एकदम सीधा
स्केल से खींची लकीर की तरह
भाई पद भी प्रतिष्ठा भी
अकड बिना शोभा नही पाता
अधूरा पन ढक जाता
व्यक्ति विचार ओर आचरण का
पद रहते
नियति की व्यवस्था का हस्तक्षेप
व्यक्तित्व देता औकात देता
स्व की पहचान का मार्ग
यही से
समय बोध का स्पर्श
चेतना भरता
केवल जागृति काल तक
स्वप्नवत जीवन मे यथार्थ स्पंदन
हृदय की हलचल
खीचने लगती तार यथार्थ
ओर नही रह पाता जीवन
अब अस्वाभाविक
ढीले स्वाभाविक जीवन में
होने लगती यथार्थ की ईस्त्री
ओर चेतन
संवेदनशील होकर करता
स्व मूल्यांकन
नही रह पाता फिर
अंतर
भीतर ओर बाहर का
नही जरूरत किसी अन्य रूतबे की
परम की पहचान का
असली रूतबा
बन जागा खुद का स्वभाव ।
छगनलाल गर्ग ।
अपने खुद के स्वभाव में
बहुत दुर हो चुका
अपने आप से
नही पहचान पाता अपना ही मूल
यह होना भी
एक जरूरत बनकर उभरी
जीने निमित्त
कर्तव्य निर्वहन निमित्त
अहसास करना
शायद अब अधिक ठीक होगा
बचना उघडना सब समय का खेल
कंधे ठीक रहेगे खुद के
अस्वाभाविक रूतबा जिया
हैसियत को दबाकर
शायद अस्वीकार कर
कडप लिए कपडे की तरह
किये रहा ईस्त्री
नही रखी सलवटे धार दार रहा
एकदम सीधा
स्केल से खींची लकीर की तरह
भाई पद भी प्रतिष्ठा भी
अकड बिना शोभा नही पाता
अधूरा पन ढक जाता
व्यक्ति विचार ओर आचरण का
पद रहते
नियति की व्यवस्था का हस्तक्षेप
व्यक्तित्व देता औकात देता
स्व की पहचान का मार्ग
यही से
समय बोध का स्पर्श
चेतना भरता
केवल जागृति काल तक
स्वप्नवत जीवन मे यथार्थ स्पंदन
हृदय की हलचल
खीचने लगती तार यथार्थ
ओर नही रह पाता जीवन
अब अस्वाभाविक
ढीले स्वाभाविक जीवन में
होने लगती यथार्थ की ईस्त्री
ओर चेतन
संवेदनशील होकर करता
स्व मूल्यांकन
नही रह पाता फिर
अंतर
भीतर ओर बाहर का
नही जरूरत किसी अन्य रूतबे की
परम की पहचान का
असली रूतबा
बन जागा खुद का स्वभाव ।
छगनलाल गर्ग ।