Wednesday, June 8, 2016

सवेरे

उठते ही सवेरे 
अनजान अदृश्य आवाज 
बहुत अस्पष्ट उठती 
अचेतन मे
शायद मस्जिद मे मुल्ला की
शब्द नहीं
पर स्वरों का दर्द
जाना पहचाना भीतर का पाता
उठते ही अपने हिस्से के
इष्टदेव को क्षमा मांगते
अनजानी गलती की
धोता हूँ चेहरा
नल का ठंडा पानी दे जाता
भरपूर चेतना
भीतर बेटी अपने बच्चे को
स्नान के साथ
फटकार देती मांजती जाती तन उसका
अंग्रेजी स्कूल काबिल
थरथराता बच्चा भारी बस्ते के साथ
होगा अभी तैयार
आकृति पूर्णाकार लिए
उभरती हैं मेरे मनोमष्तिस्क
उधर के कमरे की रोशनी मे
परीक्षा की तैयारी मे जुटा
बेटा
पीछले बारह वर्षो से
कर रहा तैयारी
चलो आशा भरा जीवन मुबारक
ओर इधर दूधवाला
बाहर खडा घूरता कहता
बाबूजी
दो महिने हुए अबकी बार करो हिसाब
मैं भीतर ही भीतर
सिहंरता हूँ अबकी बार
पैशन आय मे भी
आयकर कट जायेगा
चलो शायद बडे वाला कुछ
मदद करे
एक निश्वास लेता हूँ
सवेरे की पहेली
ओर करता हूँ मजबूत
खुद को
पूरे दिन के लिए जीने को ।
छगन लाल गर्ग ।