हमेशा की तरह
मेरे सांई राम आऊंगा
तेरी चौखट
गुरूवार भी आज
नहीं रहता अहसास
कि अंतराल बीच
अनेकानेक अभिव्यक्तियां
डालती जाती अवरोध
ओर समय हो जाता लंबा
रोकता विवशता वस
पर आता तो हूँ मेरे सांई
बिना आए चैन नहीं
अजीब हैं
बड़ी श्रृद्धा लिए भक्तों की कतार
बीच अनमनापन लिए
अजनबी की तरह तेरा होने का
विश्वास संजोये
सरकता तो हूँ तेरी ओर
पास आते ही नहीं रहता मैं
होने लगता हूँ विलीन
तेरी प्रतिमा मे सशरीर
अबाध अरूप पर क्यों
नहीं जानता
बुदबुदाता हूँ अपनी भाषा
सस्वर कि पहुँच पाये तुम तक
नहीं देते हो प्रतिक्रिया
जानता हूँ
पर एक तस्सली लिए तृप्त होता
कि सुना दिया तुम्हें
आगे कि तुम जानों
निवृत्त हुआ भार देकर
बहुत भारी वजनी लोग
चुकता करते हैं हिसाब
मेरी सामर्थ्य नहीं सांई
केवल भार अर्पित करना स्वार्थ मेरा
ओर करता हूँ प्रति दिन
नहीं समझ सका
मेरे प्रभु
क्या मूर्त रहकर
समझ लेते हो
अमूर्त भाव
अस्फूट चित विकलता
या केवल
हमारी श्रृद्धा देती हमे
अचेतन मे चेतन का बल
कि तुम प्रबल बन
दे जाते पुलकन
क्षुब्ध दशा मे
ओर जीवन की गति
लेने लगती फिर
अदृश्य श्वास चेतन की
नहीं समझ सका प्रभु
हाँ आस्था का दीप
अदृश्य सा जलता रहे
कतार का अंश बना
रहूँ तेरे समीप मेरे सांई
आने का सामर्थ्य देते रहना
चौखट तक तेरी ।
छगन लाल गर्ग ।
मेरे सांई राम आऊंगा
तेरी चौखट
गुरूवार भी आज
नहीं रहता अहसास
कि अंतराल बीच
अनेकानेक अभिव्यक्तियां
डालती जाती अवरोध
ओर समय हो जाता लंबा
रोकता विवशता वस
पर आता तो हूँ मेरे सांई
बिना आए चैन नहीं
अजीब हैं
बड़ी श्रृद्धा लिए भक्तों की कतार
बीच अनमनापन लिए
अजनबी की तरह तेरा होने का
विश्वास संजोये
सरकता तो हूँ तेरी ओर
पास आते ही नहीं रहता मैं
होने लगता हूँ विलीन
तेरी प्रतिमा मे सशरीर
अबाध अरूप पर क्यों
नहीं जानता
बुदबुदाता हूँ अपनी भाषा
सस्वर कि पहुँच पाये तुम तक
नहीं देते हो प्रतिक्रिया
जानता हूँ
पर एक तस्सली लिए तृप्त होता
कि सुना दिया तुम्हें
आगे कि तुम जानों
निवृत्त हुआ भार देकर
बहुत भारी वजनी लोग
चुकता करते हैं हिसाब
मेरी सामर्थ्य नहीं सांई
केवल भार अर्पित करना स्वार्थ मेरा
ओर करता हूँ प्रति दिन
नहीं समझ सका
मेरे प्रभु
क्या मूर्त रहकर
समझ लेते हो
अमूर्त भाव
अस्फूट चित विकलता
या केवल
हमारी श्रृद्धा देती हमे
अचेतन मे चेतन का बल
कि तुम प्रबल बन
दे जाते पुलकन
क्षुब्ध दशा मे
ओर जीवन की गति
लेने लगती फिर
अदृश्य श्वास चेतन की
नहीं समझ सका प्रभु
हाँ आस्था का दीप
अदृश्य सा जलता रहे
कतार का अंश बना
रहूँ तेरे समीप मेरे सांई
आने का सामर्थ्य देते रहना
चौखट तक तेरी ।
छगन लाल गर्ग ।