ढकने लगा अपना प्याला
बाहर की उडती धूल
आने लगती भीतर कच्ची सड़क
थरथराती तेज पहियों की गति से
छोडती हैं दर्द का धुऑ
धूल भरा
करता रहता बार बार श्वास अवरुद्ध
ओर उठती जाती खाँसी
बूढ़े तन से
रूक जाता हूँ मैं
पहुँचता हूँ ट्राई साइकिल बैठे
अपाहिज बूढ़े भिखारी के पास
प्लास्टिक का प्याला
कंपकंपाते हाथो छिपाने की शेष्टा मे
लगते बूढ़े की तरफ
बढाता हूँ दस का नोट
उतावली मे गिरता चाय का प्याला
ओर बढता हाथ
एक नयी संवेदना का बिम्ब
अंकित हो जाते हैं मेरे चित
आह जीवन
तेरा यह रूप
कितना विभत्स कितना क्रूर
अच्छा रहता
मानव की यह जिन्दगी
तब्दील हो जाती किसी शैल मे
जहां नहीं हो पाती
अनुभूति कसक भरी बोझिल
लाचार क्षमता हीन
कि अचेतन समाया यह दर्द
पीघल नहीं बन पाता वेदना का ताल
आह रे जीवन
कब तक धोना होगा
मानव का मानव से मिले
अभिशाप का दाग ।
छगन लाल गर्ग ।
बाहर की उडती धूल
आने लगती भीतर कच्ची सड़क
थरथराती तेज पहियों की गति से
छोडती हैं दर्द का धुऑ
धूल भरा
करता रहता बार बार श्वास अवरुद्ध
ओर उठती जाती खाँसी
बूढ़े तन से
रूक जाता हूँ मैं
पहुँचता हूँ ट्राई साइकिल बैठे
अपाहिज बूढ़े भिखारी के पास
प्लास्टिक का प्याला
कंपकंपाते हाथो छिपाने की शेष्टा मे
लगते बूढ़े की तरफ
बढाता हूँ दस का नोट
उतावली मे गिरता चाय का प्याला
ओर बढता हाथ
एक नयी संवेदना का बिम्ब
अंकित हो जाते हैं मेरे चित
आह जीवन
तेरा यह रूप
कितना विभत्स कितना क्रूर
अच्छा रहता
मानव की यह जिन्दगी
तब्दील हो जाती किसी शैल मे
जहां नहीं हो पाती
अनुभूति कसक भरी बोझिल
लाचार क्षमता हीन
कि अचेतन समाया यह दर्द
पीघल नहीं बन पाता वेदना का ताल
आह रे जीवन
कब तक धोना होगा
मानव का मानव से मिले
अभिशाप का दाग ।
छगन लाल गर्ग ।