जीना बाकी रहा
अकारण का
यह जीना अब
दुनिया दारी का नहीं
जिससे लाभ मिले अपनों को
एक पड़ाव हैं यह
ठहरी हुई जिन्दगी
छाया रहित
बेढंगी भी कुरूप भी
अंतिम का अवशेष
केवल सार सार बाकी रहा
जो हो तुम असलियत मे
सत्य का एक विद्रुप बिम्ब
ऊपरी आवरण वह नहीं
जिसे जीते रहे
अपना अभिन्न आत्मसात रूप माने
नहीं वह अब
अहं का बीज ही
जर्जर हुआ
ओर जो बचा अब
नहीं वह स्वीकार्य यहां
अचेतन मे यात्रा का
प्रथम चरण का द्वार अब
पावन विशुद्ध सम विषम एकाकार बना
अब यहीं जो हैं मूल यथार्थ
केवल अंतर का सच
अब यह शरीर बना
मन का पिंजरा
मर्मज्ञ मन
ओर मौन की शक्ति
महसूस करता
यह तन हैं मात्र पिंजरा
चेतना का जलता जिसमें दीया
जल रहा जलता रहेगा
बाहर का रस
अब नहीं भाता
भीतर का चाँद दिखते ही
बाहर की रोशनी
नहीं रही
अवशेष अब उसी रोशनी से
नहाना चाहता
अवशेष स्पंदन तक ।
छगन लाल गर्ग ।
अकारण का
यह जीना अब
दुनिया दारी का नहीं
जिससे लाभ मिले अपनों को
एक पड़ाव हैं यह
ठहरी हुई जिन्दगी
छाया रहित
बेढंगी भी कुरूप भी
अंतिम का अवशेष
केवल सार सार बाकी रहा
जो हो तुम असलियत मे
सत्य का एक विद्रुप बिम्ब
ऊपरी आवरण वह नहीं
जिसे जीते रहे
अपना अभिन्न आत्मसात रूप माने
नहीं वह अब
अहं का बीज ही
जर्जर हुआ
ओर जो बचा अब
नहीं वह स्वीकार्य यहां
अचेतन मे यात्रा का
प्रथम चरण का द्वार अब
पावन विशुद्ध सम विषम एकाकार बना
अब यहीं जो हैं मूल यथार्थ
केवल अंतर का सच
अब यह शरीर बना
मन का पिंजरा
मर्मज्ञ मन
ओर मौन की शक्ति
महसूस करता
यह तन हैं मात्र पिंजरा
चेतना का जलता जिसमें दीया
जल रहा जलता रहेगा
बाहर का रस
अब नहीं भाता
भीतर का चाँद दिखते ही
बाहर की रोशनी
नहीं रही
अवशेष अब उसी रोशनी से
नहाना चाहता
अवशेष स्पंदन तक ।
छगन लाल गर्ग ।