Monday, June 13, 2016

नहीं कहता

अब नहीं कहता
अगर अपना दर्द
नहीं कारण
कि पीना सिख गया
जाम की तरह
पिघलते जज्बातों को
घेरता जलन का धुंआँ
अटका देता
कंठ करता जाता
अवरूद्ध
महसूस करता
शब्दों की सामर्थ्य नहीं
कि पिघलकर ले सके
आकार धुंएँ का
ओर दे सके हकीकत
क्षुब्ध हृदय की विरह दशा
यह भी
नहीं कहता
कि हूँ चौंट खाया बिंब
जर्जर विखण्डित
परमाणु सा
सभ्य आत्मा
ना समझ ले
अस्तित्व बौनेपन का
फिर जीवन का होना
संदेह ना दे जाये
कि मानव भी हूँ।
छगन लाल गर्ग।