अनन्त खुलापन
गगन तेरा
हर करवट पलटता
पाता तेरा खुला आकार
पर तभी
जब उठाता नजरे ऊपर
तेरा यह खुलापन ओर ऊँचाई
आशक्त करती मुझे
केवल आशक्ति नहीं
प्राण उर्जा बहती तेरी ओर
संवेदन एक अर्थ देता
जीने का
खुलापन ही जीवन की
शात्विकता हैं
ओर यह खुलापन व्यक्तित्व अंश
आता तभी
बनते खुद अपने मालिक
आत्मलीन होना होगा
खुद की मालिकी हित
ओरो पर यह आसान हैं
शिवाय खुद के
ओर तभी पा सकते जीवन की ऊँचाई
जैसे भी हम आज हैं
अच्छे बुरे
निर्माता हमही हैं ।
छगनलाल गर्ग।
गगन तेरा
हर करवट पलटता
पाता तेरा खुला आकार
पर तभी
जब उठाता नजरे ऊपर
तेरा यह खुलापन ओर ऊँचाई
आशक्त करती मुझे
केवल आशक्ति नहीं
प्राण उर्जा बहती तेरी ओर
संवेदन एक अर्थ देता
जीने का
खुलापन ही जीवन की
शात्विकता हैं
ओर यह खुलापन व्यक्तित्व अंश
आता तभी
बनते खुद अपने मालिक
आत्मलीन होना होगा
खुद की मालिकी हित
ओरो पर यह आसान हैं
शिवाय खुद के
ओर तभी पा सकते जीवन की ऊँचाई
जैसे भी हम आज हैं
अच्छे बुरे
निर्माता हमही हैं ।
छगनलाल गर्ग।