Sunday, June 12, 2016

समर्पण

समर्पण होने दो
विलग रहा पर भरा नही 
किनारो की सीमा मे बहा
लगातार 
विश्रान्ति कहां पाया
जल हूँ मैं 
बहाव चाहता हूँ 
तुम ढाल देते हो मुझे 
अपने निज मनचाहे आकार मैं 
ओर मैं विवश लाचार बना
गढ लेता आकार अपना
जो तुम चाहो
मेरा होना होना
मायने नहीं तुम्हारे 
विकल उदभ्रान्त सा
मेरा यह जीवन 
पर तुम नदी हो
मेरे कण कण समर्पण से 
विशालता पाई हो
घनीभूत बन बही हो
मेरा अस्तित्व केवल किनारे का हैं 
जिसे हर कोई 
अपनी गरज आता
गन्दला कर जाता हैं 
बहो तुम 
अबाध निरन्तर विलय मेरा पाये
मैं तुम्हारा सूक्ष्म अंश ही तो हूँ 
हमारा आपसी मिलन 
तुम्हारा नया रूपान्तरण हैं 
बहती रहो जीवन के समतल मे
प्रवाह तुम्हारा मेरी गति हैं 
परमानन्द हैं 
लक्ष्य हमारा सागर हैं 
महा विलय उसी मे हैं 
हमदोनो का
एकाकार होना परम प्राप्ति हैं 
डरो नहीं 
सागर समीप आया 
समय आया 
महाविलय का अवसर हैं 
तुम तुम हो
मैं मैं हूँ 
अस्तित्व हैं 
सागर विलय बाद भी
नदी उसका जल हैं 
सागर विलय से विशाल 
विस्तार पाया हैं 
राग बीज हम दोनों के
मरे कहां हैं
छगनलाल गर्ग।