समर्पण होने दो
विलग रहा पर भरा नही
किनारो की सीमा मे बहा
लगातार
विश्रान्ति कहां पाया
जल हूँ मैं
बहाव चाहता हूँ
तुम ढाल देते हो मुझे
अपने निज मनचाहे आकार मैं
ओर मैं विवश लाचार बना
गढ लेता आकार अपना
जो तुम चाहो
मेरा होना न होना
मायने नहीं तुम्हारे
विकल उदभ्रान्त सा
मेरा यह जीवन
पर तुम नदी हो
मेरे कण कण समर्पण से
विशालता पाई हो
घनीभूत बन बही हो
मेरा अस्तित्व केवल किनारे का हैं
जिसे हर कोई
अपनी गरज आता
गन्दला कर जाता हैं
बहो तुम
अबाध निरन्तर विलय मेरा पाये
मैं तुम्हारा सूक्ष्म अंश ही तो हूँ
हमारा आपसी मिलन
तुम्हारा नया रूपान्तरण हैं
बहती रहो जीवन के समतल मे
प्रवाह तुम्हारा मेरी गति हैं
परमानन्द हैं
लक्ष्य हमारा सागर हैं
महा विलय उसी मे हैं
हमदोनो का
एकाकार होना परम प्राप्ति हैं
डरो नहीं
सागर समीप आया
समय आया
महाविलय का अवसर हैं
तुम तुम हो
मैं मैं हूँ
अस्तित्व हैं
सागर विलय बाद भी
नदी उसका जल हैं
सागर विलय से विशाल
विस्तार पाया हैं
राग बीज हम दोनों के
मरे कहां हैं ।
छगनलाल गर्ग।
विलग रहा पर भरा नही
किनारो की सीमा मे बहा
लगातार
विश्रान्ति कहां पाया
जल हूँ मैं
बहाव चाहता हूँ
तुम ढाल देते हो मुझे
अपने निज मनचाहे आकार मैं
ओर मैं विवश लाचार बना
गढ लेता आकार अपना
जो तुम चाहो
मेरा होना न होना
मायने नहीं तुम्हारे
विकल उदभ्रान्त सा
मेरा यह जीवन
पर तुम नदी हो
मेरे कण कण समर्पण से
विशालता पाई हो
घनीभूत बन बही हो
मेरा अस्तित्व केवल किनारे का हैं
जिसे हर कोई
अपनी गरज आता
गन्दला कर जाता हैं
बहो तुम
अबाध निरन्तर विलय मेरा पाये
मैं तुम्हारा सूक्ष्म अंश ही तो हूँ
हमारा आपसी मिलन
तुम्हारा नया रूपान्तरण हैं
बहती रहो जीवन के समतल मे
प्रवाह तुम्हारा मेरी गति हैं
परमानन्द हैं
लक्ष्य हमारा सागर हैं
महा विलय उसी मे हैं
हमदोनो का
एकाकार होना परम प्राप्ति हैं
डरो नहीं
सागर समीप आया
समय आया
महाविलय का अवसर हैं
तुम तुम हो
मैं मैं हूँ
अस्तित्व हैं
सागर विलय बाद भी
नदी उसका जल हैं
सागर विलय से विशाल
विस्तार पाया हैं
राग बीज हम दोनों के
मरे कहां हैं ।
छगनलाल गर्ग।