शिकवा कहां मुझे
कि दर्द दिया
यह कहना कि क्या दे सकूँ मैं
सब मिल गया
उदासी की घड़ी को
अनजाना सहारा मिल गया
ओर सहारा सालता हैं
भीतर को कुरेदता हैं
फिर बार बार भरता अहोभाव
एक दर्द
मेरी तरफ नजर का
कि दर्द लायक माना
कि मुझे काटने
निखारने लायक समझा
यह आग भीतरी भीतरी
पीड़ा पाकर निखरने की
कि जल जाये भीतरी कचरा
फिर प्रकटे पावन सा
स्वर्ण मेरा
वक्त के प्रहार झेले
अपनी मूल चमक खोया सा
निर्मल चित धरे
फिर चमके
कहां हैं शिकवा मुझे ।
छगनलाल गर्ग।
कि दर्द दिया
यह कहना कि क्या दे सकूँ मैं
सब मिल गया
उदासी की घड़ी को
अनजाना सहारा मिल गया
ओर सहारा सालता हैं
भीतर को कुरेदता हैं
फिर बार बार भरता अहोभाव
एक दर्द
मेरी तरफ नजर का
कि दर्द लायक माना
कि मुझे काटने
निखारने लायक समझा
यह आग भीतरी भीतरी
पीड़ा पाकर निखरने की
कि जल जाये भीतरी कचरा
फिर प्रकटे पावन सा
स्वर्ण मेरा
वक्त के प्रहार झेले
अपनी मूल चमक खोया सा
निर्मल चित धरे
फिर चमके
कहां हैं शिकवा मुझे ।
छगनलाल गर्ग।