Sunday, June 12, 2016

विरासत

विरासत से पाया
स्वतः
बिना प्रयास तुम मिली मुझे 
ओर मैं 
तुझे पाकर इठलाया
मदमस्त हुआ 
बार बार निहारू तुझे 
भला लगता हैं 
अपने आपको पाये
प्रकृति तेरी कहां खोज की मैने
पर तुम मेरे समूचे व्यक्तित्व पर 
छायी हो
कभी कभी नवाचार मोह मे
झुठलाऊ तुझे 
ओर पाश्चात्य मोह फसा
आग्रह करता
मूल जड से विद्रोह की
तब क्या मैं बचा पाता स्वयं को
अपनापन फिर फिर 
अदृश्य रास्तो से
मुझे लौटाता
अपनी मूल की ओर
तभी केवल तभी 
एक ठौर पाता
माँ की गौद सा ममत्व
लौटाता मेरी मूल की ओर
प्रकृति की ओर जो सनातन हैं 
भीतरी उर्जा का स्त्रोत हैं तू
उमडता प्यार 
तेरी सर्वोत्तम ऊँचाई पर
लगाता गले तुझे 
तू वहीं वहीं बन जाती हो
मेरी संस्कृति 
मेरा जीवन प्राण
तभी रह पाता हूँ 
मैं भारतीय
छगनलाल गर्ग।