विरासत से पाया
स्वतः
बिना प्रयास तुम मिली मुझे
ओर मैं
तुझे पाकर इठलाया
मदमस्त हुआ
बार बार निहारू तुझे
भला लगता हैं
अपने आपको पाये
प्रकृति तेरी कहां खोज की मैने
पर तुम मेरे समूचे व्यक्तित्व पर
छायी हो
कभी कभी नवाचार मोह मे
झुठलाऊ तुझे
ओर पाश्चात्य मोह फसा
आग्रह करता
मूल जड से विद्रोह की
तब क्या मैं बचा पाता स्वयं को
अपनापन फिर फिर
अदृश्य रास्तो से
मुझे लौटाता
अपनी मूल की ओर
तभी केवल तभी
एक ठौर पाता
माँ की गौद सा ममत्व
लौटाता मेरी मूल की ओर
प्रकृति की ओर जो सनातन हैं
भीतरी उर्जा का स्त्रोत हैं तू
उमडता प्यार
तेरी सर्वोत्तम ऊँचाई पर
लगाता गले तुझे
तू वहीं वहीं बन जाती हो
मेरी संस्कृति
मेरा जीवन प्राण
तभी रह पाता हूँ
मैं भारतीय ।
छगनलाल गर्ग।
स्वतः
बिना प्रयास तुम मिली मुझे
ओर मैं
तुझे पाकर इठलाया
मदमस्त हुआ
बार बार निहारू तुझे
भला लगता हैं
अपने आपको पाये
प्रकृति तेरी कहां खोज की मैने
पर तुम मेरे समूचे व्यक्तित्व पर
छायी हो
कभी कभी नवाचार मोह मे
झुठलाऊ तुझे
ओर पाश्चात्य मोह फसा
आग्रह करता
मूल जड से विद्रोह की
तब क्या मैं बचा पाता स्वयं को
अपनापन फिर फिर
अदृश्य रास्तो से
मुझे लौटाता
अपनी मूल की ओर
तभी केवल तभी
एक ठौर पाता
माँ की गौद सा ममत्व
लौटाता मेरी मूल की ओर
प्रकृति की ओर जो सनातन हैं
भीतरी उर्जा का स्त्रोत हैं तू
उमडता प्यार
तेरी सर्वोत्तम ऊँचाई पर
लगाता गले तुझे
तू वहीं वहीं बन जाती हो
मेरी संस्कृति
मेरा जीवन प्राण
तभी रह पाता हूँ
मैं भारतीय ।
छगनलाल गर्ग।