वहीं हो तुम
करूण स्वरों की पुकार
ध्वनित हो कान पाते ही
भीतर उठती वेदना की गूँज
वहीं हो तुम
खिलता कुसुम
ताजी आभा का मोहक लावण्य
नथूनो समाती भीनी सी खुशबू
अस्तित्व भूला
ठगा सा
अपलक निहारे सौन्दर्य का
केन्द्रीभूत नजारा
वहीं हो तुम
न तुम देह
न तुम मन
न पुरुष
न नारी
न जवान ही
न बूढ़े ही
तुम इनके पार हो
तुम वहीं हो
जो इन सभी को
कहीं अदृश्य बना
चुपके चुपके
देखता हैं
तुम वहीं तो हो।
छगनलाल गर्ग।
करूण स्वरों की पुकार
ध्वनित हो कान पाते ही
भीतर उठती वेदना की गूँज
वहीं हो तुम
खिलता कुसुम
ताजी आभा का मोहक लावण्य
नथूनो समाती भीनी सी खुशबू
अस्तित्व भूला
ठगा सा
अपलक निहारे सौन्दर्य का
केन्द्रीभूत नजारा
वहीं हो तुम
न तुम देह
न तुम मन
न पुरुष
न नारी
न जवान ही
न बूढ़े ही
तुम इनके पार हो
तुम वहीं हो
जो इन सभी को
कहीं अदृश्य बना
चुपके चुपके
देखता हैं
तुम वहीं तो हो।
छगनलाल गर्ग।