Sunday, June 12, 2016

वहीं हो तुम

वहीं हो तुम 
करूण स्वरों की पुकार 
ध्वनित हो कान पाते ही
भीतर उठती वेदना की गूँज 
वहीं हो तुम 
खिलता कुसुम 
ताजी आभा का मोहक लावण्य
नथूनो समाती भीनी सी खुशबू 
अस्तित्व भूला
ठगा सा
अपलक निहारे सौन्दर्य का
केन्द्रीभूत नजारा
वहीं हो तुम 
तुम देह
तुम मन
पुरुष 
नारी 
जवान ही
बूढ़े ही
तुम इनके पार हो
तुम वहीं हो
जो इन सभी को
कहीं अदृश्य बना
चुपके चुपके 
देखता हैं 
तुम वहीं तो हो।
छगनलाल गर्ग।