मेरा नेह
मुग्ध मन का भीगा कोना
विपुल संसार से ऊँचा
अनन्त को छूता
झिलमिल झिलमिल करता सा
आभा से खुद ही नहाया
लावण्य सौन्दर्य सा निखरा निखरा सा
मुक मौन तपस्वी सा
एकाग्र निमग्न सा
तालमय रागमय मनमय तनमय हुआ सा
नितान्त मौन
गहराई रस सागर डूबा सा
शब्द कहां यहाँ
बेशब्द साधक सा
न हैं शब्द
न हैं ध्वनि
न हैं देह
ओर न हैं मन
केवल हैं तो नेह
चेतना की असीम ऊँचाई हैं यह
नेह स्वीकृति भी बाधा हो जाती हैं मेरी
यही तल हैं
यही पल हैं
यही नेह हैं
यहाँ न तुम तुम हो
यहाँ न मैं मैं ही हूँ
केवल विलय
हमारा तुम्हारा
विलय होना
अस्तित्व खोना
यही सच्चे प्रेम की आखिरी
ऊँचाई हैं
हम सभी इस पल से ही
नेह मर्म की अनुभति पाते हैं
यही परमात्मा हैं
पुजारी हम ही हैं
हम ही हैं सच्चे नेह पुजारी
नेह मंदिर मे
अन्य पुजारी प्रेम की दीवार हैं ।
छगनलाल गर्ग।
मुग्ध मन का भीगा कोना
विपुल संसार से ऊँचा
अनन्त को छूता
झिलमिल झिलमिल करता सा
आभा से खुद ही नहाया
लावण्य सौन्दर्य सा निखरा निखरा सा
मुक मौन तपस्वी सा
एकाग्र निमग्न सा
तालमय रागमय मनमय तनमय हुआ सा
नितान्त मौन
गहराई रस सागर डूबा सा
शब्द कहां यहाँ
बेशब्द साधक सा
न हैं शब्द
न हैं ध्वनि
न हैं देह
ओर न हैं मन
केवल हैं तो नेह
चेतना की असीम ऊँचाई हैं यह
नेह स्वीकृति भी बाधा हो जाती हैं मेरी
यही तल हैं
यही पल हैं
यही नेह हैं
यहाँ न तुम तुम हो
यहाँ न मैं मैं ही हूँ
केवल विलय
हमारा तुम्हारा
विलय होना
अस्तित्व खोना
यही सच्चे प्रेम की आखिरी
ऊँचाई हैं
हम सभी इस पल से ही
नेह मर्म की अनुभति पाते हैं
यही परमात्मा हैं
पुजारी हम ही हैं
हम ही हैं सच्चे नेह पुजारी
नेह मंदिर मे
अन्य पुजारी प्रेम की दीवार हैं ।
छगनलाल गर्ग।