Sunday, June 12, 2016

पुराने पहचाने

पल काटता हैं 
भीतर अति भीतर 
उभरता एक अनचाहा दर्द 
धुऑ घना एकीभूत होता
एक बिम्ब बना आकार पाता 
ओर मैं विवेक शून्य हो
भर जाता हूँ 
बन जाता तनाव का दरिया 
ओर आकृति पाया दर्द 
ओर विशाल काय बना
रौदता हैं अस्तित्व मेरा
फिर फिर प्रयास करता
जोडना चाहू टूटा बिखरा सा
मेरा अपनापन
मेरा व्यक्तित्व अस्तित्व 
ओर यह अंत हीन 
दर्दिला दरिया 
प्रखर वेग से
मय प्रचण्ड लहरों संग
नाजुक दिल छोर छूती हुई
विनाशक बाढ़ सी
टकरा जाती हैं 
जख्म घाव गहरे होते
रोते हैं 
मैं मूक विवश तकता रहता
पल तुझे
वाणी लायक बनी कहां 
कि समझा पाऊ तुझे 
फक्त देखते रहना
खामोशी से
कातर नयनो से
वक्त तेरा अंश ही तो हैं 
दे रहा असीम खामोशी 
पल क्या मैं अकेले ही भोगू
तेरी सौगात 
यह संतप्त वेदना
नहीं पात्र मैं केवल नहीं 
ओर हैं 
पल की त्रासदी झेले 
पाते तुझे भोगते तुझे हैं 
ओर तुम बनाते जाते
एक दर्द भरा रिस्ता 
जो भोगते त्रासदी दर्द 
उनकी मेरी खामोशी के रूप 
पल तुम भिन्न भिन्न 
लेते हो
पर मूल तो तुम ही हो
दर्द शक्ल बदलने से मुझे 
धोखा दौगे कैसे 
मैं जान गया तुम्हें पल
खामोशी वहीं तुम वहीं 
पुराने पहचाने हो
छगनलाल गर्ग।