पल काटता हैं
भीतर अति भीतर
उभरता एक अनचाहा दर्द
धुऑ घना एकीभूत होता
एक बिम्ब बना आकार पाता
ओर मैं विवेक शून्य हो
भर जाता हूँ
बन जाता तनाव का दरिया
ओर आकृति पाया दर्द
ओर विशाल काय बना
रौदता हैं अस्तित्व मेरा
फिर फिर प्रयास करता
जोडना चाहू टूटा बिखरा सा
मेरा अपनापन
मेरा व्यक्तित्व अस्तित्व
ओर यह अंत हीन
दर्दिला दरिया
प्रखर वेग से
मय प्रचण्ड लहरों संग
नाजुक दिल छोर छूती हुई
विनाशक बाढ़ सी
टकरा जाती हैं
जख्म घाव गहरे होते
रोते हैं
मैं मूक विवश तकता रहता
पल तुझे
वाणी लायक बनी कहां
कि समझा पाऊ तुझे
फक्त देखते रहना
खामोशी से
कातर नयनो से
वक्त तेरा अंश ही तो हैं
दे रहा असीम खामोशी
पल क्या मैं अकेले ही भोगू
तेरी सौगात
यह संतप्त वेदना
नहीं पात्र मैं केवल नहीं
ओर हैं
पल की त्रासदी झेले
पाते तुझे भोगते तुझे हैं
ओर तुम बनाते जाते
एक दर्द भरा रिस्ता
जो भोगते त्रासदी दर्द
उनकी मेरी खामोशी के रूप
पल तुम भिन्न भिन्न
लेते हो
पर मूल तो तुम ही हो
दर्द शक्ल बदलने से मुझे
धोखा दौगे कैसे
मैं जान गया तुम्हें पल
खामोशी वहीं तुम वहीं
पुराने पहचाने हो ।
छगनलाल गर्ग।
भीतर अति भीतर
उभरता एक अनचाहा दर्द
धुऑ घना एकीभूत होता
एक बिम्ब बना आकार पाता
ओर मैं विवेक शून्य हो
भर जाता हूँ
बन जाता तनाव का दरिया
ओर आकृति पाया दर्द
ओर विशाल काय बना
रौदता हैं अस्तित्व मेरा
फिर फिर प्रयास करता
जोडना चाहू टूटा बिखरा सा
मेरा अपनापन
मेरा व्यक्तित्व अस्तित्व
ओर यह अंत हीन
दर्दिला दरिया
प्रखर वेग से
मय प्रचण्ड लहरों संग
नाजुक दिल छोर छूती हुई
विनाशक बाढ़ सी
टकरा जाती हैं
जख्म घाव गहरे होते
रोते हैं
मैं मूक विवश तकता रहता
पल तुझे
वाणी लायक बनी कहां
कि समझा पाऊ तुझे
फक्त देखते रहना
खामोशी से
कातर नयनो से
वक्त तेरा अंश ही तो हैं
दे रहा असीम खामोशी
पल क्या मैं अकेले ही भोगू
तेरी सौगात
यह संतप्त वेदना
नहीं पात्र मैं केवल नहीं
ओर हैं
पल की त्रासदी झेले
पाते तुझे भोगते तुझे हैं
ओर तुम बनाते जाते
एक दर्द भरा रिस्ता
जो भोगते त्रासदी दर्द
उनकी मेरी खामोशी के रूप
पल तुम भिन्न भिन्न
लेते हो
पर मूल तो तुम ही हो
दर्द शक्ल बदलने से मुझे
धोखा दौगे कैसे
मैं जान गया तुम्हें पल
खामोशी वहीं तुम वहीं
पुराने पहचाने हो ।
छगनलाल गर्ग।